नीति आयोग ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा दिए गए प्रमाणित आंकड़ों और विश्लेषणों के आधार पर यह घोषित किया है कि भारत जापान को पछाडक़र विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है. जिस रफ्तार से हमारी अर्थव्यवस्था मजबूती से आगे बढ़ रही है, उसको देखते हुए यह अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2028 तक भारत जर्मनी को पछाडक़र तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा. नीति आयोग के विश्लेषण और अनुमान को नकारने का कोई कारण नजर नहीं आता.जाहिर है.यह कोई सामान्य उपलब्धि नहीं, बल्कि बीते दो दशकों में भारत द्वारा अपनाए गए मिश्रित सुधारवादी मॉडल, डिजिटल ढांचे और जनसांख्यिकीय लाभांश की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है.भारत ने जर्मनी को पीछे छोड़ा, अब लक्ष्य जर्मनी और अंतत: चीन है.यह लक्ष्य केवल शक्ति का नहीं, संतुलन और नेतृत्व का भी है. एक ओर जहां अमेरिका तकनीकी प्रभुत्व के बल पर शीर्ष पर है, वहीं चीन की अर्थव्यवस्था मंदी की मार, जनसंख्या घटाव और राजनीतिक केंद्रीकरण से जूझ रही है. भारत के पास न केवल इन दोनों के अनुभवों से सीखने का अवसर है, बल्कि एक वैकल्पिक आर्थिक सभ्यता के निर्माण की ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी है.भारत की जीडीपी आज लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर है.चीन 17-18 ट्रिलियन और अमेरिका 26 ट्रिलियन के पास है. पहली दृष्टि में यह फासला बहुत बड़ा लगता है, लेकिन भारत की विकास दर, खासकर 7 फीसदी के आसपास बनी रहने की संभावना, इस अंतर को क्रमश: पाट रही है. यदि चीन की वृद्धि दर 4 प्रतिशत से नीचे स्थिर होती है और भारत अपनी ऊर्जा, श्रम और नवाचार को समर्पित दिशा में साधता है, तो 2034-35 तक भारत चीन को पीछे छोड़ सकता है, लेकिन यह गणित केवल जीडीपी की रफ्तार से नहीं, रणनीतिक निर्णयों की सटीकता से तय होगा.
बहरहाल, आर्थिक सुधार महज अब नारा नहीं, आर्थिक जीवनशैली होता जा रहा है. ध्यान रहे भूमि, श्रम और न्यायिक सुधार की गति यदि धीमी रही तो जनांकिकीय लाभांश जन-संकट में बदल सकता है. भारत को हर साल एक करोड़ से अधिक नौकरियों की आवश्यकता है, जबकि वर्तमान विनिर्माण क्षेत्र उसकी आधी भी नहीं दे पा रहा. शिक्षा और स्वास्थ्य में राज्य सरकारों की लापरवाही से मानव संसाधन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, जो दीर्घकालिक विकास में बाधक बनेगी. देश को रेवड़ी कल्चर से भी बचाना पड़ेगा, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशन में व्यापक चुनाव सुधारों की जरूरत है. इसके अलावा भारतीय अर्थव्यवस्था को केवल सेवा आधारित होने से बाहर निकलना होगा—उसे उत्पादन, नवाचार और तकनीकी प्रभुत्व के नए केंद्र बनाने होंगें.
क्या हम सिलिकॉन वैली की नकल करेंगे या शंघाई (चीन) के मॉडल पर जाएंगे जबकि आवश्यकता है कि हम अपना ‘डिजिटल खादी’ बनाएं यानी स्वदेशी तकनीक के आधार पर मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का विस्तार करें. इसके अलावा एक प्रश्न यह भी है कि क्या विकास केवल शहरों तक सीमित रहेगा या गांवों तक स्वायत्त आर्थिक ढांचे पहुंचेंगे?
चीन ने जब विश्व की दूसरी अर्थव्यवस्था बनने की ओर कूच किया था, उसने अपने अंदरूनी ढांचे को लोहे के अनुशासन से साधा था. भारत अपनी तासीर से कभी भी अधिनायकवादी नहीं हो सकता. हमें लोकतंत्र में रहते हुए केंद्रीकृत परिणाम प्राप्त करने हैं. यही हमारी सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा अवसर है.
हम जर्मनी से आगे निकल चुके हैं, जर्मनी अब हमारे काफी समीप है, लेकिन इस दौड़ की असली जीत तभी होगी जब भारत आर्थिक शक्ति के साथ सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय संतुलन का मार्ग भी प्रशस्त करे। इसलिए भारत का चौथी अर्थव्यवस्था बनना एक घोषणा नहीं, बल्कि एक चुनौतीपूर्ण निमंत्रण है,जो आने वाले वर्षों में इतिहास लिखने की बजाय इतिहास को दिशा देगा। चीन को पीछे छोडऩा अब आकांक्षा नहीं, आवश्यकता बन गया है और यह आवश्यकता भारत को केवल महाशक्ति नहीं, ‘महा-दृष्टा’ बनने के लिए प्रेरित कर रही है.
