
सचिन शितोले सारंगखेड़ा निवाली। विविध रंगोके नखरीले और श्रृंगार से सजे साज सज्जा ‑से सजे धजे घोड़ो को देखने के लिये। सारंगखेड़ा के अश्व बाजार में हर समय आकर्षित होते हैं घोड़ों की जानकारी रखने लेने वाले पारखी, ढोल और घुंघरू के ताल पर नाचने वाले घोड़े के मास्टर और दर्शक और अश्व बाजार के पारखी का “हुर्रर्र… हूर्रर्र…” की आवाज के साथ घोष करते हैंऐसा गुंजणारा आगळा सुर प्रत्येक को घोड़े के प्रेम में वेध लावे बिना नहीं रहता। घोड़े के प्रेम में बंधे लोग भी हुर्र हुर्र की आवाज निकलने लगतीं है
सारंगी वाद्य तैयार करने वाले गाँव के रूप में पहचान रखने वाले सारंगखेड़ा में अब सारंगी वाद्य तो लुप्त हो गया है, फिर भी उसके अश्व बाजार के माध्यम से सूर सर्वत्र गुंजायमान हो रहें हैंनिनादित हो रहा है। लगभग अश्वो की खरीद बिकरी करने वालो के लिये यह यात्रा देश के कोने कोने से अश्व‑शौकीनों को यहाँ बुला रही है। मानो यहाँ अश्वों का कुंभ मेला भर गया हो।
शहादा‑दोंडाईचा मार्ग पर स्थित चेतक मैदान पर तकरीबन 30 एकड़ क्षेत्र में यह अश्व बाजार व चेतक फेस्टिवल सजाया गया है। यहाँ के अश्व बाजार में अब तक 3000 अश्व दाखिल हुए हैं। उनमें से 200 अश्वों की बिक्री से 70 लाख की खरीद बिक्री हुई है।
देश के विभिन्न राज्यों के अश्व व्यापारी, खरीदार, शौकीन और पर्यटक यहाँ पहुँच रहे हैं, जिससे विभिन्न राज्यों के अश्व‑प्रेमियों का अच्छा मिलाप हो रहा है। देश भर में सबसे बड़ा अश्व बाजार यहाँ भरता है।
देश में पुष्कर, बालोद्रा, नागौर, सोनपुर, बाराबंकी प्रमुख घोड़े‑बाजार हैं। इनमें से सारंगखेड़ा घोड़े‑बाजार को व्यापार की दृष्टि से अधिक पसंद किया जाता है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, गुजरात आदि राज्यों से चार‑पाँच पीढ़ियों से व्यापारी सारंगखेड़ा आते हैं।
बाजार में पंजाब, मारवाड़, काठियावाड़, सिंध, गावठी आदि नस्लों के घोड़े बिक्री के लिये आते हैं। इस वर्ष उत्तम‑उत्तम घोड़े लेकर यहाँ के बाजार में व्यापारी आयेहै एक‑एक अस्सल जाति‑वंत घोड़े को निरख‑पारख कर खरीदा , लिया जाता है। बछेरे (बच्चे) 20 हजार और घोड़े 50 हजार से 10 करोड़ तक की कीमत वाले घोड़े यहाँ बिक्री के लिये आए हैं।
पंजाबी घोड़ों की मांग – मारवाड़ी जाति के घोड़े ऊंचे होते हैं, उनकी ऊँचाई 6‑7 फुट होती है। वे दिखने में आकर्षक होते हैं, उनके कान उँचे और टोके एक‑दूसरे से जुड़े होते हैं।
काठियावाड़ी घोड़े – तजेलदार रंग के, कान कम ऊंचे, चेहरा पसरट, जिससे वे भारदस्त दिखते हैं।
पंजाबी घोड़े– शुभ्र और तेजस्वी, उनके सफ़ेद रंग पर हल्का डाग होता है। इन्हें “नुकरा” कहा जाता है और इनकी विशेष मांग रहती है।
घोड़ों की कीमतें – घोड़े के अंग में जन्मजात रूप, स्वभाव, शुभ गुण और तंदुरुस्ती पर कीमत निर्भर करती है, परन्तु उनकी चाल, रपेट, नाच‑काम, रुबाबदारपना भी खरीदार देख कर कीमत तय करते हैं। घोड़े के नखरे उसके सौंदर्य का प्रतीक होते हैं और इस बाजार में कई घोड़ों के नखरे शौकीनों को आकर्षित करते हैं।
36 गुण शुभ लक्षण – 36 गुणों वाले घोड़ों को उत्तम माना जाता है। इनमें पाँच कल्याणी, देवमन, कंठ, जयमंगल, श्यामकर्ण आदि प्रमुख गुण हैं। साथ ही 72 खोटी भी होती हैं, जैसे कपाळावर दो भवरे (मेडासिंग), बेलाफोड, पाठीवर भवरा (छत्रभंग), तंगजवळ भवरा (तंगतोड), पोटाच्या मध्यभागी भवरा (गोम) आदि।
17 शृंगार घोड़ी “औरत के 16 सिंगार, पर घोड़ी के 17 सिंगार” वाली कहावत के अनुसार, घोड़े को सजाने के लिये 17 प्रकार के शृंगार का प्रयोग किया जाता है। इस कारण यहाँ साज‑सजावट की दुकानें लगी सजी हुई है
