
भोपाल। भूमिका नाट्य समूह द्वारा गुरुवार शाम प्रशासन अकादमी, शाहपुरा में नाटक मुसाफिर का मंचन किया गया। शाम छह बजे शुरू हुए इस प्रस्तुति का नाट्य विचार और निर्देशन गोपाल दुबे ने किया। दर्शकों से भरे सभागार में कलाकारों ने जीवन, यात्रा और मानवीय संवेदनाओं की गहराइयों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
नाटक की कथा रेल यात्रा के दौरान शुरू होती है, जहां एक डिब्बे में छह मुसाफिर मिलते हैं। अलग अलग स्वभाव और पृष्ठभूमि होने के बावजूद सफर के दौरान वे धीरे धीरे एक दूसरे से खुलते हैं और अपने सुख दुख साझा करने लगते हैं। आगरा जा रहा एक युवक, जिसे किताबें पहुंचानी हैं, उनसे एक खेल खेलने का सुझाव देता है। लेखक के नाम वाली चिट निकालकर एक एक मुसाफिर कहानी पढ़ता है और जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है वे स्वयं उन किरदारों में ढलते चले जाते हैं।
मंचन के दौरान कुल छह कहानियों को जीवंत किया गया। सबसे पहले गुलजार की कहानी दस पैसे और दादी प्रस्तुत की गई। इसके बाद अजातशत्रु का व्यंग्यात्मक अमृतसर दादर एक्सप्रेस में, चंद्रकांत बक्शी की कहानी वो एक शाम, भगवतीचरण वर्मा की कहानी खिलावन का नरक, पुनः गुलजार की रावी पार और अंत में आचार्य चतुरसेन की आवरागर्द को मंच पर रूपायित किया गया। सभी कहानियां ट्रेन यात्रा और यात्रियों के अनुभवों पर आधारित थीं, जिनमें मानवीय भावनाओं, दर्द और जीवन के उतार चढ़ाव को प्रभावशाली रूप से उकेरा गया।
नाटक के अंत में यह संदेश प्रभावी रूप से सामने आता है कि जीवन भी एक यात्रा है जिसमें कई अनजाने अपने बन जाते हैं और कई अपने ही पराए लगने लगते हैं। यही जीवन की बदलती परतें हैं जिन्हें यह प्रस्तुति संवेदनशीलता से उजागर करती है।
मंच पर उद्देश्य अगरैया, संगीता ठाकुर, यशील दुबे, रंजीत ठाकुर, आशीर्वाद झा और गोपाल दुबे ने मुसाफिरों की भूमिकाएं निभाईं। सभी कलाकारों ने कहानी के भावों को सहजता और गहराई से दर्शाया।
