
इंदौर. पिछले महिने एयरपोर्ट रोड पर हुए गंभीर हादसे के बाद राज्य की शीर्ष अदालत ने शहर की ट्रैफिक व्यवस्था पर कड़ा रुख अपनाया है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रशासन की कार्यप्रणाली, चालान प्रणाली और क्रियान्वयन की धीमी गति को लेकर तीखी टिप्पणियां कीं.
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर ने इंदौर में नो एंट्री के बावजूद ट्रक के प्रवेश से हुए हादसे को गंभीरता से लेते हुए सुनवाई में ट्रैफिक व्यवस्था पर सख्त नाराजगी जताई. मामले में स्वतः संज्ञान लेने वाली युगलपीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उच्च पुलिस अधिकारियों को तलब किया. सुनवाई के दौरान बताया गया कि हादसे के बाद शहर में 1244 चालान बनाए गए हैं. इस पर पीठ ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या स्वयं इस बात का प्रमाण है कि नियम तोड़ने की गुंजाइश ही बनी रही. टिप्पणी की गई कि कार्रवाई का उद्देश्य उल्लंघन होते ही चालान काटना नहीं, बल्कि नियमों का पालन सुनिश्चित करना होना चाहिए. कोर्ट ने यह भी कहा कि कई स्थानों पर जवान नियम तोड़ने वालों को पकड़ने के लिए पेड़ों के पीछे खड़े रहते हैं, जबकि सड़कों पर उनकी मौजूदगी ही दुर्घटनाओं को रोक सकती है. पीठ ने यह भी पूछा कि क्या किसी निश्चित तिथि तक चालान का लक्ष्य पूरा करने का दबाव होता है. अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत ट्रैफिक सुधार योजना पर भी सवाल उठाए गए. न्यायाधीशों ने कहा कि 75 दिन पहले जो एक्शन प्लान अदालत में पेश किया था, उसका पालन जमीनी स्तर पर होता नहीं दिख रहा है. अदालत ने विशेष रूप से पूछा कि भारी वाहनों के प्रवेश, नो एंट्री व्यवस्था और बढ़ते हादसों को रोकने के लिए कोई ठोस रणनीति क्यों लागू नहीं की गई. सुनवाई में यह भी उल्लेख किया कि प्रतिबंधित समय के बावजूद भारी वाहन शहर में प्रवेश कर रहे हैं और ड्रिंक एंड ड्राइव के मामले भी सामने आ रहे हैं. अधिकारियों ने तर्क दिया कि आवश्यक सेवाओं से जुड़े बड़े वाहनों को अनुमति दी गई है और जागरूकता अभियान जारी है. बताया गया कि ट्रैफिक वॉलंटियर भी तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी संख्या अब 600 से अधिक हो चुकी है. इस बीच, इंदौर खंडपीठ ने भी शहर के जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों को 27 नवंबर को हाजिर रहने के आदेश दिए हैं. पहले पेश किए गए एक्शन प्लान के बावजूद सड़कों पर अतिक्रमण, चौराहों पर जाम और पुलिस की केवल चालानी कार्रवाई पर निर्भरता जैसी समस्याएँ जस की तस बनी हुई हैं. ट्रैफिक प्रबंधन को लेकर सुप्रीम कोर्ट की कमेटी भी पहले अपनी नाराजगी जता चुकी है.
