ग्वालियर चंबल डायरी
हरीश दुबे
“माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं, तू मेरा शौक़ देख मेरा इंतिज़ार देख।” लगता है कि मशहूर शायर इक़बाल ने बरसों पहले यह लाइनें शायद उन कमलदलियों के लिए लिखी होंगी जो निगम, बोर्ड और प्राधिकरणों में ताजपोशी का इंतजार करते अघा गए हैं। हालांकि अब यह कहा जा रहा है कि अगले महीने तक इन नियुक्तियों की सूचियां जारी कर दी जाएंगी लेकिन इंतजार की इंतहा इस दावे पर यकीन नहीं होने दे रही। पार्टी के सूबा सदर बीते रोज ग्वालियर तशरीफ लाए तो पदाभिलाषी उनके आगे पीछे मंडराते रहे। वे पदों की दौड़ में शामिल कुछ नेताओं के घर भी पहुंचे।
चूंकि नियुक्तियां सत्ता और संगठन के समन्वय से होंगी, लिहाजा नियुक्तियों में बैतूल की भूमिका अहम रहने वाली है। पहले हरियाणा, दिल्ली और फिर बिहार विधानसभा चुनावों में आला लीडरान की व्यस्तता के चलते निगम मंडलों में नियुक्तियों के मसले को होल्ड पर रखा गया था, पार्टी ने इन चुनावी चुनौतियों पर कामयाबी से पार पा ली है, लिहाजा कहा जा रहा है कि अब ऐलान में देर नहीं होगी।
पता चला है कि सूबे के सभी सूबेदारों की राय से बनी नियुक्तियों की पहली फेहरिस्त को सीएम ने अपनी मोहर लगाकर शीर्ष नेतृत्व को भेज दिया है। सत्ता वीथिकाओं में दिल्ली की मंजूरी का इंतजार है। ग्वालियर में जीडीए, साडा और मेला जैसे बड़े प्राधिकरण आधे दशक से राजनीतिक नेतृत्व के बगैर ही चल रहे हैं। पहले कमलनाथ और सिंधिया की रस्साकसी में उलझकर सूचियां अटकी रहीं।
शिवराज के आखिरी कार्यकाल में भी नियुक्तियां अटकी रहीं, चुनाव के एक, सवा साल पहले शिवराज सरकार ने कुछ निगम मंडलों में नियुक्तियां की भी, लेकिन इस सूची में ज्यादातर उन सिंधिया समर्थक पूर्व विधायकों को एडजस्ट किया गया, जिन्होंने कमलनाथ का तख्ता पलट कर प्रदेश में कमलदल की वापसी के लिए अपनी विधायकी और मंत्रीपद कुर्बान किया था। इन नियुक्तियों में मूल भाजपा के कैडर को नामचारे के लिए ही जगह मिली। इस बार भी भाजपा के मूल और महल, दोनों खेमों की ओर से बढ़ाए गए नामों को एग्जाई कर फाइनल लिस्ट बनाने के लिए पार्टी के स्ट्रेटजिक मैनेजमेंट को खासी मशक्कत करना पड़ी है
बिहार विजेता के अंदाज में नरोत्तम का स्वागत, मिल सकता है इनाम
बिहार चुनाव में एनडीए की जीत के बाद पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा जब पहली बार दतिया आए तो पीताम्बरा नगरी की सड़कों पर उनका कुछ इस अंदाज में स्वागत हुआ, जैसे वे खुद चुनाव जीतकर आए हैं, वो दिन याद आ गए जब वे प्रदेश में मिनिस्टर बनने के बाद पहली मर्तबा दतिया आए थे। वैसे यह सच है कि बिहार चुनाव में मप्र की इस धार्मिक नगरी के नेता ने बड़ी जिम्मेदारी संभाली, खास बात यह कि जिन सीटों पर उन्होंने चुनाव प्रचार किया, वहां भाजपा को कामयाबी भी मिली।
नरोत्तम चुनाव प्रचार के लिए दतिया और डबरा से एक बड़ी टोली भी ले गए थे। प्रदेश की राजनीति में फिलहाल हाशिए पर चल रहे नरोत्तम के समर्थकों को उम्मीद है कि बिहार की मेहनत उनके सियासी सफर में कुछ तो फूल खिलाएगी, राज्यसभा के टिकट और भाजपा की प्रदेश अध्यक्षी हासिल करने में नाकाम रहने के बाद अब नरोत्तम को किसी वजनदार निगम मंडल की जिम्मेदारी मिलने की अटकलें लगाई जा रही हैं।
चुनाव में अभी तीन बरस, इसलिए एसआईआर में नहीं ले रहे रुचि
सूबे में विधानसभा चुनाव में अभी तीन बरस बाकी हैं, शायद यही वजह है कि चुनाव आयोग द्वारा चलाई जा रही एसआईआर मुहिम में ग्वालियर चंबल अंचल में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के नेताओं से लेकर कार्यकर्ता तक खास रुचि नहीं दिखा रहे। दोनों दलों के कार्यकर्ता यह सोच बैठे हैं कि ढाई साल बाद विधानसभा चुनाव के पहले मतदाता सूचियों के प्रारंभिक प्रकाशन उपरांत दावे आपत्ति लेने की प्रक्रिया में नामों की घटाबढ़ करा लेंगे।
कार्यकर्ताओं के बड़े तबके के इस भ्रम को दूर करने भाजपा के राष्ट्रीय एसआईआर प्रभारी तरुण चुघ को ग्वालियर आना पड़ा। वे दिनभर मैराथन बैठकों में व्यस्त रहे। मप्र कांग्रेस में एसआईआर प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे पीसी शर्मा तो लगभग हर हफ्ते ही ग्वालियर आ रहे हैं। पीसी जिले के लगभग हर विधानसभा क्षेत्र में पहुंचकर भोपाल से आई टीम के साथ पदाधिकारियों को ट्रेनिंग दे चुके हैं। इन दौरों के बाद दोनों दलों में सक्रियता बढ़ी है।
