भारत विकसित और आत्मनिर्भर होने के लिए अधीर, दुनिया के लिए उम्मीद का मॉडल:मोदी

नयी दिल्ली 17 नवम्बर (वार्ता) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि वैश्विक अस्थिरता के बावजूद हमारी जीडीपी करीब सात प्रतिशत की दर से बढ रही है और भारत केवल एक उभरता बाजार ही नहीं है बल्कि एक उभरता मॉडल भी है जो दुनिया के लिए उम्मीद की किरण है। श्री मोदी ने सोमवार देर शाम यहां छठा रामनाथ गोयंका व्याख्यान देते हुए कहा कि भारत विकसित और आत्मनिर्भर होने के लिए अधीर है।

प्रधानमंत्री ने श्री गोयंका की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि श्री गोयंका को अक्सर अधीर कहा जाता था नकारात्मक अर्थ में नहीं, बल्कि सकारात्मक अर्थ में। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि यही अधीरता परिवर्तन के उच्चतम स्तर के प्रयासों को प्रेरित करती है, वही अधीरता जो ठहरे हुए पानी को भी गति प्रदान करती है। प्रधानमंत्री ने एक समानता स्थापित करते हुए कहा, “आज का भारत भी अधीर है—विकसित होने के लिए अधीर, आत्मनिर्भर बनने के लिए अधीर”। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी के पहले पच्चीस साल तेज़ी से बीत गए, एक के बाद एक चुनौतियाँ आईं, फिर भी कोई भी भारत की गति को रोक नहीं सका।

उन्होंने कहा ,” वैश्विक अस्थिरता के बावजूद हमारी जीडीपी करीब सात प्रतिशत की दर से बढ रही है और भारत केवल एक उभरता बाजार ही नहीं है भारत एक उभरता मॉडल भी है। आज दुनिया भारत के वृद्धि के मॉडल को उम्मीद का मॉडल मान रही है।”

आत्मनिभर्रता और विकसित राष्ट्र बनने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में भारत की ऊंची छलांग का उल्लेख करते हुए श्री मोदी ने कहा ,”भारत विकसित होने के लिए अधीर है । भारत आत्मनिर्भर होने के लिए अधीर है।”

उन्होंने कहा कि सरकार लगातार सैचुरेशन के मिशन पर काम कर रहे हैं यानि किसी भी योजना के लाभ से एक भी लाभार्थी छूटे नहीं।

प्रधानमंत्री ने कहा,” भारत में करीब 94 करोड़ लोग अब सामाजिक सुरक्षा के दायरे में हैं एक दशक पहले यह संख्या केवल 25 करोड़ रूपये थी जिसका अर्थ है कि उस समय केवल 25 करोड ही सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से लाभान्वित होते थे। आज यह आंकडा बढकर 94 करोड हो गया है ।”

श्री मोदी ने कहा कि देश के विकास के लिए यह बहुत जरूरी होता है कि विकास का लाभ सभी तक पहुंचें ।उन्होंने किसी का नाम लिए बिना कहा कि एक परिवार तक सीमित दलों ने सामाजिक न्याय के नाम पर अपना स्वार्थ सिद्ध किया है।

उन्होंने कहा,” दलित पीडित शोषित सभी तक जब सभी तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचता है तो सामाजिक न्याय सुनिश्चित होता है लेकिन हमने देखा है कि बीते कुछ दशकों में कैसे समाजिक न्याय के नाम पर कुछ दलों कुछ परिवारों ने अपना ही स्वार्थ सिद्ध किया है । मुझे आज संतोष है कि देश सामाजिक न्याय को सच्चाई में बदलते देखा रहा है।”

नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें स्थानीय भाषाओं में पढाई पर बल दिया गया है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत अंग्रेजी भाषा का विरोध करता है।

उन्होंने कहा ,” हमने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्थानीय भाषाओं में पढाई पर विशेष बल दिया है ।

हमारा विरोध अंग्रेजी भाषा से नहीं है हम भारतीय भाषाओं के समर्थन में हैं।”

श्री गोयंका के बारे में विस्तार अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा ,” आज हम एक ऐसे विशिष्ट व्यक्तित्व को सम्मानित करने के लिए एकत्रित हुए हैं जिन्होंने भारत में लोकतंत्र, पत्रकारिता, अभिव्यक्ति और जनांदोलनों की शक्ति को बढ़ाया। एक दूरदर्शी, संस्था निर्माता, राष्ट्रवादी और मीडिया नेता के रूप में श्री गोयनका ने इंडियन एक्सप्रेस समूह को न केवल एक समाचार पत्र के रूप में, बल्कि भारत के लोगों के बीच एक मिशन के रूप में स्थापित किया। उनके नेतृत्व में यह समूह भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय हितों की आवाज़ बन गया।”

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि 21वीं सदी के इस युग में, जब भारत विकसित होने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, श्री गोयनका की प्रतिबद्धता, प्रयास और दूरदर्शिता प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि रामनाथ जी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन किया, बाद में जनता पार्टी का समर्थन किया और जनसंघ के टिकट पर चुनाव भी लड़ा। विचारधारा से परे, उन्होंने हमेशा राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी। प्रधानमंत्री ने कहा कि जिन लोगों ने वर्षों तक रामनाथ जी के साथ काम किया, वे अक्सर उनके द्वारा साझा किए गए कई किस्से सुनाते हैं। उन्होंने याद दिलाया ,” स्वतंत्रता के बाद, जब हैदराबाद में रजाकारों द्वारा अत्याचार का मुद्दा उठा, तो रामनाथ जी ने सरदार पटेल की सहायता की। 1970 के दशक में, जब बिहार में छात्र आंदोलन को नेतृत्व की आवश्यकता थी, तो रामनाथ जी ने नानाजी देशमुख के साथ मिलकर श्री जयप्रकाश नारायण को आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए राजी किया। आपातकाल के दौरान, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री के एक करीबी मंत्री ने रामनाथ जी को बुलाकर कारावास की धमकी दी, तो उनकी यह साहसिक प्रतिक्रिया इतिहास के गुप्त अभिलेखों का हिस्सा बन गई। हालाँकि इनमें से कुछ विवरण सार्वजनिक हैं और कुछ अभी भी अज्ञात हैं, फिर भी ये सभी रामनाथ जी की सत्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता और कर्तव्य के प्रति उनकी दृढ़ निष्ठा को दर्शाते हैं, चाहे उनके सामने कितनी भी बड़ी शक्ति क्यों न रही हो।”

 

 

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