भारत जलवायु परिवर्तन से प्रभावित शीर्ष 10 देशों में शामिल

बेलेम, 12 नवंबर (वार्ता) जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले शीर्ष दस देशों में भारत भी शामिल है।

बुधवार को यहां जारी रिपोर्ट में भारत सहित संवेदनशील देशों पर लू, तूफान और बाढ़ जैसी चरम मौसम की घटनाओं के असर को प्रमुख कारक बताया गया है।

जर्मन वॉच द्वारा जारी 2026 जलवायु जोखिम सूचकांक के अनुसार, डोमिनिका, म्यांमार और होंडुरास पिछले तीन दशकों में चरम मौसम से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले तीन देश हैं। शीर्ष रैंकिंग में शामिल अधिकतर देश वैश्विक दक्षिण में हैं लेकिन कई यूरोपीय देश और अमेरिका भी शीर्ष 30 में शामिल हैं जो जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभावों को दर्शाता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व की लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या अर्थात तीन अरब से अधिक लोग उन 11 देशों में रहते हैं जो पिछले 30 वर्षों में जलवायु संबंधी चरम मौसम से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। भारत शीर्ष 10 में नौवें स्थान पर है जबकि चीन 11वें स्थान पर है और इसका भी जलवायु परिवर्तन में उल्लेखनीय योगदान रहा है। लीबिया और हैती इसके ठीक बाद आते हैं जबकि हाल के दिनों में भयंकर तूफान कालमेगी और फंग-वोंग से प्रभावित फिलीपींस सातवें स्थान पर है।

रिपोर्ट के मुताबिक विकसित देश भी इन चुनौतियों से अछूते नहीं हैं, औद्योगिक देशों में फ्रांस 12वें और इटली 16वें स्थान पर है जबकि अमेरिका 18वें स्थान पर है। सूचकांक में 1995 और 2024 के बीच 9,700 से अधिक चरम मौसम की घटनाओं को शामिल किया गया है जिसके कारण 8.3 लाख से अधिक लोगों की मौतें हुई हैं और 4.5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से ज्यादा का प्रत्यक्ष नुकसान हुआ है।

रिपोर्ट के अनुसार गर्म लहरें एवं तूफान मानव जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं और इनसे सबसे ज्यादा आर्थिक नुकसान होता है जबकि बाढ़ से सबसे ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत लगातार जलवायु प्रभावों से प्रभावित शीर्ष देशों में से एक रहा है क्योंकि 2020 में जारी जर्मन वॉच के पहले सूचकांक में कहा गया था कि देश में 2018 में चरम मौसम की घटनाओं से सबसे ज्यादा मौतें (2,081) हुईं। वर्ष 2018 में आर्थिक नुकसान के मामले में भारत दूसरे स्थान पर था।

बेलेम शहर में एक भारतीय विशेषज्ञ ने कहा, “नवीनतम रिपोर्ट में जलवायु प्रभावों के संदर्भ में भारत पर पड़ने वाले अत्यधिक प्रभाव को रेखांकित किया गया है, यह न केवल वैश्विक स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी नीतिगत बदलावों की मांग करता है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि संवेदनशील आबादी भविष्य में ऐसे प्रभावों का ज्यादा मजबूती से मुकाबला कर सके।”

 

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