मिलावट के ज़हर से आम जनता को बचाएं

हाल ही में इंदौर में एक कारखाने से लगभग 4000 लीटर नकली घी बरामद हुआ है. खाने-पीने की चीजों में मिलावट खोरी बेहद चिंता का विषय है. दरअसल,भारत में शुद्ध और सुरक्षित भोजन पाना आज भी एक दुर्लभ उपलब्धि जैसा लगता है. इंदौर से लेकर दिल्ली तक, हर साल लाखों लीटर नकली खाद्य पदार्थ बरामद होते हैं,लेकिन मिलावट का यह भूमिगत उद्योग जस का तस कायम है. सवाल यह है कि जब नागरिकों की सेहत दांव पर लगी है, तब क्या भारत इस संगठित अपराध से लडऩे के लिए तैयार है ? सबसे पहले बात करते हैं उस तंत्र गत कमजोरी की, जो मिलावटखोरी को बढ़ावा देती है. खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण तथा राज्यों के खाद्य एवं औषधि विभागों पर इस लड़ाई की मुख्य जिम्मेदारी है, लेकिन संसाधन और क्षमता की कमी इस विभाग को लगभग बेबस बनाती है. देश में उपलब्ध खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं की संख्या आवश्यकतानुसार बेहद कम है. जहां लैब मौजूद हैं, वहां कई बार अत्याधुनिक उपकरण, प्रशिक्षित कर्मचारी और रसायन,सबकी कमी रहती है. परिणाम यह कि पकड़े गए नमूनों की जांच रिपोर्ट आने में महीनों लग जाते हैं. जब तक कागजी कार्रवाई आगे बढ़ती है, मिलावटखोर अपना कारोबार बदल चुके होते हैं और बाजार फिर उसी ‘ज़हर’ से भर चुका होता है.दूसरी गंभीर कमी है,कर्मचारियों की भारी कमी. एक-एक खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पास कई जिलों का प्रभार होता है. नियमित निरीक्षण, औचक छापेमारी और निगरानी,इन तीनों को एक साथ संभाल पाना लगभग असंभव हो जाता है. उधर मिलावट करने वाले गिरोह तकनीक, रसायन और वितरण नेटवर्क में लगातार नए तरीके अपनाते जा रहे हैं, जबकि प्रशासन कई जगह अब भी पुराने पारंपरिक परीक्षणों पर निर्भर है. समस्या के दूसरे आयाम में है कमजोर कानूनी ढांचा. खाद्य सुरक्षा व मानक अधिनियम और भारतीय दंड संहिता में मिलावट के विरुद्ध प्रावधान हैं, लेकिन दंड की कठोरता अपराध की गंभीरता के सामने न के बराबर है. करोड़ों का अवैध मुनाफा कमाने वाले मिलावटखोर मामूली जुर्माना भरकर छूट जाते हैं. कई मामलों में अपराध जमानती रहता है, और अदालतों में सबूतों के अभाव या रिपोर्ट के देर से आने के कारण दोष सिद्ध करना मुश्किल हो जाता है. जब तक मिलावट को मृत्यु या गंभीर स्वास्थ्य हानि से सीधे नहीं जोड़ा जाता, कठोरतम सजा लागू नहीं की जा सकती.जबकि यह स्पष्ट है कि मिलावट दरअसल धीमे ज़हर का कारोबार है.

मुद्दे की एक और हकीकत है,राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी. यह कोई रहस्य नहीं कि कई बार मिलावट का कारोबार स्थानीय रसूखदारों, व्यापारिक दबाव समूहों या राजनीतिक संरक्षण में फलता-फूलता है. छापेमारी होती है, लेकिन अक्सर त्योहारों तक सीमित रहती है. आवश्यकता है कि सरकारें इसे केवल खाद्य अपराध नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट के रूप में देखें.अब सवाल है, उपाय क्या ? सबसे पहले, केंद्र और राज्यों को तत्काल प्रभाव से खाद्य प्रयोगशालाओं की संख्या और क्षमता बढ़ानी होगी. हर जिले में मोबाइल टेस्टिंग वैन उपलब्ध कराना अनिवार्य हो. खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की बड़े पैमाने पर भर्ती की जाए. साथ ही, कानून में संशोधन कर मिलावटखोरी को गैर-जमानती अपराध घोषित किया जाए और गंभीर मामलों में आजीवन कारावास तक की सजा दी जाए.जब बात जनता के स्वास्थ्य की हो, तब कोई भी ढिलाई स्वीकार्य नहीं. यह समय है कि सरकारें मिलावट के खिलाफ एक युद्ध-स्तरीय, कठोर और स्थायी अभियान चलाएं,ताकि बाजार में बिकने वाला हर खाद्य पदार्थ सचमुच भोजन हो, न कि ज़हर !

 

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