ग्वालियर चंबल डायरी
हरीश दुबे
कांग्रेस के दौर में जीडीए के उपाध्यक्ष से लेकर कुछ दिन पहले तक पार्टी के कार्यकारी जिलाध्यक्ष और संगठन प्रभारी रहे महाराज सिंह पटेल ने यह सपने में भी नहीं सोचा होगा कि दीवाली पर विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह से उनके बंगले पर जाकर मुलाकात करना उनके लिए महंगा पड़ जाएगा और कांग्रेस के प्रति पचास साल की वफादारी इस एक त्यौहारी मुलाकात से सवालों के घेरे में आएगी। उपनगर ग्वालियर की राजनीति में बड़ा चेहरा रहे महाराज सिंह से एक ही झटके में पार्टी के सभी पद छीन लिए गए हैं, महाराज सिंह अब सिर्फ कांग्रेस के एक सक्रिय सदस्य मात्र रह गए हैं।
लेकिन वे ग्वालियर में कांग्रेस के सभी कार्यालयों और अरबों की मिल्कियत के स्वामित्व और संचालन का जिम्मा संभालने वाले गांधी स्मारक न्यास के अभी भी सचिव हैं। पार्टी चाहकर भी उनसे यह पद नहीं छीन सकती, क्योंकि सचिव का चुनाव संस्था के न्यासी करते हैं। बहरहाल, ओबीसी के प्रदेश स्तरीय अभियानों में अक्सर मंच पर नजर आने वाले महाराज सिंह को इस बात का सुकून है कि उन्हीं की पार्टी के तमाम नेताओं ने भले ही अपने अलग अलग निहितार्थ के चलते तिल का ताड़ बनाकर उनके खिलाफ प्रॉक्सी वार शुरू कर दिया है.
लेकिन बड़ी संख्या में ग्वालियर कांग्रेस के कार्यकर्ता उन्हें बेकसूर मानते हुए पार्टी के प्रति उनकी निष्ठाओं को असंदिग्ध मान रहे हैं। इस पूरे प्रसंग को अर्जुन, श्यामा और वोरा से लेकर दिग्विजय तक की सरकारों में कद्दावर मंत्री रहे एक बड़े नेता से उनकी अदावत से जोड़कर देखा जा रहा है। यह अदावत पार्टी की अनुशासन समिति के अध्यक्ष के रूप में उनके द्वारा जारी एक नोटिस से शुरू हुई थी। राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि महाराज सिंह पलटवार के शिकार हुए हैं।
युवक कांग्रेस को अध्यक्ष बनाने नहीं मिल रहे दावेदार, 24 ब्लॉकों में दुकान खाली
कांग्रेस को प्रदेश के सत्ता सिंहासन से उतरे अभी पांच बरस से कुछ ज्यादा ही समय हुआ है और वह प्रदेश में दूसरे नंबर की पार्टी होने के नाते सत्ता की प्रबल दावेदार बनी हुई है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि पार्टी के अभी इतने बुरे दिन नहीं आए हैं कि संगठन में अध्यक्ष जैसे पदों को भरने के लिए दिन में दिया लेकर दावेदार ढूंढना पड़ें और नतीजे में एक भी दावेदार न मिले। लेकिन जमीनी हकीकत बयां कर रही है कि वाकई में पार्टी को इस सूरते हाल से गुजरना पड़ रहा है।
मौजूदा वक्त युवक कांग्रेस के संगठन चुनाव चल रहे हैं लेकिन शिवपुरी जिले के 24 ब्लॉकों एवं 14 उप ब्लॉकों में युवक कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी को कार्यकर्ता नहीं मिल रहे हैं। कुछ बरस पहले तक युवक कांग्रेस के इन अध्यक्ष पदों के लिए खूब मारामारी मचती थी, दिग्गज नेताओं की सोर्स सिफ़ारिश से ही अध्यक्ष पद मिलते थे लेकिन अब दावेदार गायब हैं। करैरा विधानसभा क्षेत्र की ही बात करें तो यहां के कुल सात ब्लॉकों में से सिर्फ नरवर में ही अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी आई है, बाकी ब्लॉकों में पार्टी की दुकान खाली है। शिवपुरी जिले का सिंधिया का संसदीय क्षेत्र होना भी कांग्रेस में बने इस निराशाजनक हालात की एक वजह माना जा रहा है…!
जातीय राजनीति करने वालों की अब भिण्ड पर नजर
जातिगत मुद्दों को उछाल कर अपने सियासी मंसूबों और सोशल एजेंडों को साधने की कोशिशों को ग्वालियर जिला प्रशासन ने अपनी सख्ती के चलते कामयाब नहीं होने दिया लेकिन अब चंबल के दूसरे महत्वपूर्ण जिले भिण्ड में इन्हीं ताकतों की चहलकदमी महसूस की जा रही है। ताजा मुद्दा एक युवक को किडनैप कर उसके साथ मारपीट करने एवं उसे पेशाब पिलाने के शर्मनाक घटनाक्रम से जुड़ा है। प्रशासन इसे निजी रंजिश का मामला बता रहा है लेकिन पीड़ित युवक चूंकि दलित तबके से ताल्लुक रखता है, लिहाजा भीम आर्मी और चंद्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी ने इसे सीधे तौर पर दलित उत्पीड़न से जोर दिया है।
भीम आर्मी के सूबा सदर सत्येंद्र विद्रोही और आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव इस युवक से मिलने पहुंचे तो अंबेडकर विरोधी टिप्पणियों के लिए देशभर में चर्चा में आए ग्वालियर हाईकोर्ट बार के पूर्व सदर अनिल मिश्रा भी अपनी टीम के साथ भिंड पहुंच गए और एसपी ऑफिस पर धरना देकर बैठ गए। परशुराम सेना और करणी सेना की तरफ से भी तीखी बयानबाजी और ज्ञापन हुए। लेकिन ग्वालियर जैसी ही सख्ती भिंड के जिला प्रशासन ने बरती और कभी दस्यु समस्या के कारण देशभर में अलग पहचान रखने वाले चंबल के इस शहर में अब तलक अमन कायम है। भिंड के दबोह कस्बे में भी एक दलित युवक की हत्या के बाद सड़कों पर आगजनी, तोडफ़ोड़ जैसा बवाल मचा है, लिहाजा भिण्ड जिला प्रशासन के लिए आने वाला वक्त और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
भाजपा कार्यकारिणी में ग्वालियर का दबदबा लेकिन
कमल दल की प्रदेश कार्यकारिणी में ग्वालियर अंचल ने अपना दबदबा कायम रखा है। आशीष अग्रवाल और लोकेंद्र पाराशर अपने वर्क आउटपुट की दम पर क्रमश: प्रदेश मीडिया प्रभारी और प्रदेश मंत्री के ओहदे बचाने में कामयाब रहे वहीं इसी अंचल के तीन पुराने नेताओं शैलेन्द्र बरुआ, रणवीर रावत और सुरेन्द्र शर्मा को प्रदेश उपाध्यक्ष जैसी अहम जिम्मेदारी दी गई है। यह सच है कि इस अंचल में भाजपा का नेतृत्व कर रहे सिंधिया और नरेन्द्र सिंह के खाते में ज्यादा कुछ हासिल नहीं हुआ है क्योंकि नए बने पदाधिकारी या तो संघ की पसंद हैं या फिर सूबे के दीगर छत्रपों के संरक्षण का लाभ मिला है।
