सुप्रीम कोर्ट ने सीआईसी के लिये चुने गये लोगों के नामों का खुलासा करने संबंधी आदेश देने से इनकार किया

नयी दिल्ली, 27 अक्टूबर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि वह केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) में नियुक्ति के लिये चुने गये लोगों के नामों का सार्वजनिक रूप से खुलासा करने के लिये केन्द्र सरकार को निर्देश नहीं देगा ।

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि उसे न्यायालय द्वारा पूर्व में निर्धारित पारदर्शिता मानदंडों के केन्द्र की ओर से पालन पर “संदेह का कोई कारण नहीं” दिखता।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज द्वारा दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई कर रही थी जिसका प्रतिनिधित्व अधिवक्ता प्रशांत भूषण कर रहे थे। याचिका में सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत केंद्रीय और राज्य सूचना आयोगों में अधिक पारदर्शिता और समय पर नियुक्तियों की मांग की गयी थी।

श्री भूषण ने तर्क दिया कि जांच समिति के सदस्यों और आवेदकों की सूची का खुलासा करने के उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्देशों के बावजूद केंद्र सरकार इसका पालन करने में विफल रही है। उन्होंने कहा, “उन्होंने सीआईसी के लिए चुने गए उम्मीदवारों के नाम या चयन मानदंड जारी नहीं किए हैं। लोगों को यह जानने का अधिकार है कि किस पर विचार किया जा रहा है।”

उन्होंने आरोप लगाया कि आरटीआई व्यवस्था में कोई अनुभव न रखने वाले कुछ लोगों को आयोग में “मनमाने “तरीके से” भेजा गया है। उन्होंने एक पत्रकार की नियुक्ति का उदाहरण दिया जिनकी नियुक्ति कथित तौर पर सरकार के पक्ष में उनके लेखों के कारण की गई थी। केंद्र की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने अदालत को बताया कि जांच समिति ने अपना काम पूरा कर लिया है और प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री वाली चयन समिति दो से तीन हफ़्तों के भीतर नियुक्तियों को अंतिम रूप दे देगी।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता की भावनाओं को स्वीकार किया, लेकिन यह भी कहा कि प्रक्रिया लगभग पूरी होने वाली है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “आप सही कह रहे हैं कि देरी हो रही है, लेकिन वे थोड़े समय की माँग कर रहे हैं। सही समय आने दीजिए।”

श्री भूषण ने नियुक्तियों से पहले जानकारी सार्वजनिक करने पर ज़ोर देते हुए कहा, “नियुक्तियों से पहले पारदर्शिता होनी चाहिए, उसके बाद नहीं।” इस बीच अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नटराज ने तर्क दिया कि अयोग्य नियुक्तियों के संबंध में कोई भी शिकायत प्रक्रिया पूरी होने के बाद उठाई जा सकती है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा ” चयन के हर चरण में निरंतर न्यायिक निगरानी प्रशासनिक कामकाज को पंगु बना सकती है। अगर हम हर कदम पर न्यायिक जाँच शुरू कर देंगे, तो चयन ही नहीं होगा। पारदर्शिता सुनिश्चित की जाएगी और जानने के अधिकार से समझौता नहीं किया जाएगा। अगर किसी अयोग्य व्यक्ति की नियुक्ति होती है तो हम उसकी जाँच करेंगे। नियुक्ति कोई तयशुदा बात नहीं है।”

पीठ ने अपने आदेश में कहा, “सीआईसी के संबंध में हमें सूचित किया गया है कि जांच समिति ने प्रक्रिया पूरी कर ली है और भारत के प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय मंत्री वाली चयन समिति तीन सप्ताह के भीतर आवेदकों पर विचार करेगी। हमें इस मामले में संदेह करने का कोई कारण नहीं है । केन्द्र सरकार अंजलि भारद्वाज बनाम भारत संघ में निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन करेगी और प्रक्रिया को जल्द से जल्द अंतिम रूप देगी।”

श्री भूषण ने सुनवाई समाप्त होने से पहले न्यायालय का ध्यान झारखंड राज्य सूचना आयोग की ओर भी आकर्षित किया जो मई 2020 से निष्क्रिय है। झारखंड सरकार के अधिवक्ता ने न्यायालय को आश्वासन दिया कि रिक्तियों को भरने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं और प्रक्रिया पूरी करने के लिए 45 दिनों का समय मांगा।

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