
इटारसी। दीपावली के दूसरे दिन नगर के नयायार्ड रोड स्थित ग्वाल बाबा मंदिर में हर साल की तरह इस बार भी आस्था का सैलाब उमड़ा। सदियों पुरानी यह परंपरा पशुपालकों के लिए किसी पर्व से कम नहीं मानी जाती, जहां वे अपने पशुधन को लेकर बाबा का आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचते रहे हैं। लेकिन इस बार भी विडंबना यह रही कि पशुपालक तो पहुंचे, पर पशु नहीं। परंपरा अब धीरे-धीरे सिर्फ प्रतीकात्मक रूप में रह गई है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, ग्वाल बाबा को पशुओं का रक्षक और पालक माना जाता है। दीपावली के बाद आयोजित यह अनुष्ठान पशुओं की निरोगता और समृद्धि के लिए किया जाता है। कहा जाता है कि ग्वाल बाबा के दरबार में पशुओं को लाने से वे वर्षभर रोगों से मुक्त रहते हैं। करीब सौ साल पुरानी इस परंपरा में मेहरागांव, नाला मोहल्ला, बजरंगपुरा और आसपास के गांवों से पशुपालक बड़ी संख्या में भाग लेते हैं।
मंगलवार को भी सुबह से मंदिर परिसर में पशुपालकों की भीड़ उमड़ आई। पाल समाज के प्रतिनिधि दीपक पाल के शरीर में ग्वाल बाबा की आत्मा का अवतरण माना गया। उन्होंने मंदिर की परिक्रमा लगाकर पशुपालकों और उनके पशुधन के स्वास्थ्य की कामना की। इस दौरान आतिशबाजी और पूजा-अर्चना के दृश्य श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर रहे थे।
मंदिर परिसर में पशुओं के लिए तैयार किया गया चारा और गुड़ का प्रसाद विशेष रूप से वितरित किया गया। कई पशुपालकों ने अपने घरों पर ही गायों और बैलों को फूलों से सजाकर उनकी आरती उतारी और बाबा से आशीर्वाद मांगा।
यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है। पशुपालक एक-दूसरे से मिलकर पशुपालन से जुड़े अनुभव और समस्याएं साझा करते हैं। आधुनिकता के दौर में भी यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि इटारसी की मिट्टी में आज भी आस्था और परंपरा की जड़ें गहराई तक धंसी हुई हैं।
