अपनों से बिछड़े लोगों को नहीं मिला पा रही पुलिस, साढ़े नौ माह में सिर्फ 14 की दस्तयाबी

जबलपुर:शहर से लेकर ग्रामीण अंचल से रहस्यमय परिस्थितियों में 2,020 लोग लापता हैं जिनकी गुमशुदगी-अपहरण की दास्तान मिसिंग मिस्ट्री बन चुकी है। गायब हुए लोगों में बच्चों से लेकर युवा, बालिकाएं, महिलाएंं, युवतियां, बुजुर्ग भी शामिल है। आंकड़ों पर अगर नजर दौड़ाई जाएं तो गायब होने वाले अधिकांश नाबालिग हैं और इसमें अधिकांश स्कूल जाने वाले छात्र-छात्राएं है।
नवभारत ने पुलिस रिकॉर्ड खंगाले के साथ मप्र पुलिस की वेबसाइड पर पड़ताल की तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आये। 1 जनवरी से लेकर 15 अक्टूबर तक 2,020 लापता मिले। इससे भी हैरान करने वाली बात यह था कि साढ़े नौ माह में इतनी बड़ी संख्या में लोग गायब हुए है और पुलिस सिर्फ 14 लोगों की ही खोज पाई है। सूत्रों की माने तो इसका मुख्य कारण यह है कि ऐसे मामलों को पुलिस गंभीरता से नहीं लेती है।

गायब लोगों की तलाश के नाम पर पुलिस सिर्फ खानापूर्ति करती है अपहरण या गुमइंसान दर्ज करने के बाद मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है, तलाश कहां और कैसे चल रही है, लापता लोग कहां है इसका जवाब किसी के पास नहीं होता हैं। ऐसे में अपनों से बिछड़े लोगों का परिवार इंतजार करता रह जाता है, किसी का बेटा, तो किसी की बेटी गायब हैं तो किसी का सुहाग लापता है तोकोई प्रताडऩा समेत अन्य कारणों से शहर छोडक़र चला। अधिकांश मामलों में पुलिस के हाथ खाली है।
ये बन रही वजह,गिड़गिड़ाते परिजन-
किशोर उम्र में कुछ इश्क के जाल में फसंकर घर छोडकऱ चलते है तो कुछ परिजनों का दबाव, डांट फटकार से नाराज होकर घर से भाग रहे है तो कुछ आर्थिक तंगी, प्रताडऩा, घरेलू कारणों से भी घर छोडक़र चले गए है तो किसी का किडनैप हुआ हैं। ऐसे प्रकरण लंबित रहने कारण पुलिस तलाश करने पुलिस महत्व नहीं देना है। शिकायतें होती है प्रकरण दर्ज होता और मामले की केश डायरी थाने में धूल खाती रहती है।

पुलिस के पास बल की भी कमी है। चाइल्ड डेस्क में भी स्टाफ की कमी होती है। जबकि ऐसे मामलों को गंभीर से लेना चाहिए, विशेष टीम गठित करना चाहिए जो सिर्फ लापता लोगों को खोजने पर काम कर सके। कई मामलों में परिवार आगे नहीं आते उन्हें डर होता है कि पुलिस परेशान करेगी, बदनामी होगी। पुलिस भी प्रकरण दर्ज कर परिजनों से संपर्क नहीं करती है जिसके चलते मामले लंबित रह जाते है। सायबर सेल की सहायता के लिए पत्राचार होता है लेकिन अपडेट नहीं लिया जाता या फिर इसमें लंबा समय लग जाता है। पीडि़त परिवार पुलिस के सामने अपने चहेतों को खोजने के लिए गिड़गिड़ाते रहते हैं या थानों के चक्कर काटते रहे है लेकिन पुलिस की ओर से कोई संतोषजनक जवाब या संतुष्टिपूर्वक दिलासा नहीं दी जाती है।
हर मामले इश्क मोहब्ब्त वाले नहीं होते
पुलिस का दावा होता है कि अधिकांश 15 से 17 साल के नाबालिग के अपहरण मामले मेें पुलिस की जांच प्रेम प्रसंग में आकर ही खत्म हो रही है जिसमेेंं कोई लौट रहा है तो शहर ही छोडक़र भाग चुका है वहीं सूत्र बताते है कि हर मामले इश्क मोहब्बत से जुड़े नहीं होते है। कुछ गिरोह भी सक्रिय है जो बच्चों से मजदूरी व अन्य काम कराने के लिए उनका अपहरण करके ले जाते है।
हाईप्रोफाइल में सक्रियता, बाकी सोशल मीडिया के भरोसे
हाईप्रोफाइल मामलों में जरूर सक्रियता से पतासाजी होती है लेकिन अधिकांश मामलों में पुलिस सोशल मीडिया के भरोसे रहती है। पुलिस गुमशदगी या अपहरण दर्ज करने के साथ संबंधित तस्वीरों और जानकारी को सोशल मीडिया पर विभिन्न प्लेटफार्म पर वायरल करती हैं, ताकि यह जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सके इसमें परिजनों के साथ ही पुलिस थाने और जिले के कंट्रोल रूम तक का नम्बर दिया जाता है पुलिस की जांच ऐसी ही चलती रहती है।

उम्र – लापता – मिले
0 से 10 – 13 – 0
11 से 20 – 808 – 3
21 से 30 – 691 – 6
31 से 40 – 269 – 3
41 से 50 – 119 – 0
51 से 60 – 62 – 1
60 प्लस – 58 – 1
आंकड़े 1 जनवरी से 15 अक्टूबर तक।

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