
जबलपुर। सेवानिवृत्ति के बाद राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने अपना कर्मचारी नहीं मानते हुए पेंशन प्रदान करने से इंकार कर दिये थे। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव के आदेश को भी दरकिनार कर दिया था। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने विश्वविद्यालय के रवैये को मनमाना तथा अनुचित मानते हुए 50 हजार रूपये की कॉस्ट लगाते हुए उसका भुगतान 15 दिनों के याचिकाकर्ता को करने के आदेश जारी किये है। एकलपीठ ने विश्वविद्यालय को निर्देशित किया है कि वह याचिकाकर्ता को पेंशन का भुगतान करने आदेश जारी करे।
याचिकाकर्ता डॉ एस बी एस भदौरिया की तरफ से दायर की गयी याचिका में कहा गया था कि राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने एक आदेश जारी कर किया था। जिससे अधिकारियों को निर्देशित किया था कि याचिकाकर्ता से पेंशन संबंधित दस्तावेज नहीं लें। इसके अलावा विश्वविद्यालय ने याचिकाकर्ता को सेवानिवृत्त किये जाने के संबंध पारित आदेश को भी निरस्त कर दिया था।
एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि विवाद राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित तीन विश्वविद्यालयों के बीच में है। याचिकाकर्ता की नियुक्ति जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय में वर्ष 1988 में हुई थी। वर्ष 2009 में राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय और दूसरा नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 2009 में मध्य प्रदेश विधानमंडल के विभिन्न अधिनियमों के तहत हुई थी। इसके पूर्व राज्य के कृषि महाविद्यालय और पशु चिकित्सा महाविद्यालय 2009 तक जेएनकेवीवी के अधीन थे। साल 2009 में जेएनकेवीवी का विभाजन किया गया, जिसके बाद विश्वविद्यालय अस्तित्व में आए।
याचिकाकर्ता की सेवाएँ वर्ष 2010 में ही आरवीएसकेवीवी को सौंप दी थीं, आरवीएसकेवीवी वर्ष 2012 में याचिकाकर्ता को मध्य प्रदेश राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम में प्रतिनियुक्ति की अनुमति दी थी। हाईकोर्ट ने इस संबंध में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव के समक्ष अभ्यावेदन पेश करने निर्देश दिये थे। प्रमुख सचिव ने आरवीएसकेवीवी को निर्देश दिये थे कि याचिकाकर्ता को पेंशन का लाभ प्रदान किया जाये।
आरवीएसकेवीवी की तरफ से तर्क दिया गया कि राज्य सरकार का उपरोक्त आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर है। विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश विधानमंडल द्वारा पारित अधिनियम के तहत स्थापित किया गया है। राज्य सरकार का हस्तक्षेप विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का उल्लंघन करते हों। एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि सरकारी निकायों के बीच मुकदमेबाजी केवल तभी अदालत में आनी चाहिए जब उसका समाधान सरकारी स्तर पर नहीं हो सके। विश्वविद्यालय का अस्तित्व सरकार पर निर्भर है। विश्वविद्यालय ने मनमाना तथा अनुचित आदेश जारी करते हुए सरकार की आलोचना की। एकलपीठ ने याचिका का निराकरण करते हुए उक्त आदेश जारी किये।
