भोपाल। मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि परम प्रेम में अर्पण का भाव होता है, पाने या शिकायत का नहीं। उन्होंने अहंभाव, अहोभाव, भक्तिभाव और भोगभाव की व्याख्या करते हुए बताया कि अहंभाव दुःख और अशांति का कारण है, जबकि अहोभाव से जीवन में सहजता, संतोष और प्रसन्नता आती है। भक्तिभाव अहंभाव को मिटाकर अहोभाव को जाग्रत करता है, जिससे सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा कि संसारिक प्रेम परिस्थितियों पर निर्भर होता है, जबकि प्रभुभक्ति परम प्रेम की अभिव्यक्ति है, जो कभी घटती नहीं, बल्कि बढ़ती जाती है।
प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि मंगलवार को शरद पूर्णिमा पर 32 अर्घ समर्पित किए गए और वृहद शांतिधारा सहित गणधर वलय विधान संपन्न हुआ।
