नयी दिल्ली, 15 अप्रैल (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं से उत्पन्न होने वाले मुद्दों पर निर्णय देते समय सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता है लेकिन न्यायालय ने यह संकेत भी दिया कि वह ऐसी प्रथाओं से संबंधित जनहित याचिकाओं के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं कर सकता।
सबरीमला संदर्भ की सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ न्यायिक समीक्षा के दायरे, अनुच्छेद 25 , 26 और अनुच्छेद 14 के बीच संतुलन ,’संवैधानिक नैतिकता’ की भूमिका और धार्मिक मामलों में जनहित याचिकाओं की स्वीकार्यता से संबंधित प्रमुख सवालों की जांच कर रही है।
पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के अलावा न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि अदालतों को धार्मिक मामलों में एक सीमित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उन्होंने उन सिद्धांतों के विस्तार के खिलाफ आगाह किया, जो न्यायिक हस्तक्षेप की अनुमति देते हैं।
उन्होंने ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं’ के सिद्धांत का विरोध करते हुए तर्क दिया कि संवैधानिक संरक्षण केवल वहीं तक सीमित नहीं किया जा सकता, जिसे अदालतें अनिवार्य मानती हैं। उनके अनुसार, यह तय करना अदालतों का काम नहीं है कि कोई प्रथा अनिवार्य है या नहीं, क्योंकि धर्म को उसके मानने वालों के विश्वास के माध्यम से समझा जाना चाहिए।
श्री सिंघवी ने धार्मिक प्रथाओं के परीक्षण के लिए ‘संवैधानिक नैतिकता’ के उपयोग के खिलाफ भी तर्क दिया। उन्होंने कहा कि यह शब्द संविधान में कहीं नहीं है और अस्पष्ट बना हुआ है। उन्होंने कहा कि इसे धार्मिक मान्यताओं को अमान्य करने के लिए बाहरी मानक के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। उन्होंने आगाह किया कि इसे लागू करने से अनुच्छेद 25 और 26 के तहत बने ढांचे के लिए अस्थिर करने वाले परिणाम हो सकते हैं।
जनहित याचिकाओं के मुद्दे पर श्री सिंघवी ने तर्क दिया कि पुरानी धार्मिक प्रथाओं को दी जाने वाली चुनौतियों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए जो प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी याचिकाओं को स्वीकार करने का मानक बहुत ऊंचा होना चाहिए।
पीठ ने संकेत दिया कि धार्मिक मामलों में जनहित याचिकाओं पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना संभव नहीं हो सकता है। न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि जहां कोई प्रथा प्रथम दृष्टया सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य या नैतिकता का उल्लंघन करती है, वहां अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि गंभीर मामलों में अदालत स्वत: संज्ञान भी ले सकती है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने आगाह किया कि अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत सामाजिक सुधार की शक्ति का उपयोग किसी धर्म के मूल स्वरूप को नष्ट करने के लिए नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा, “सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर आप धर्म को खोखला नहीं कर सकते।”
श्री सिंघवी ने अनुच्छेद 25(2)(बी) और अनुच्छेद 26(बी) की सामंजस्यपूर्ण व्याख्या का तर्क देते हुए कहा कि सार्वजनिक प्रकृति के मंदिरों में प्रवेश सभी वर्गों के लिए खुला हो सकता है, लेकिन गर्भगृह में अनुष्ठान का तरीका धार्मिक संप्रदाय के अधिकार क्षेत्र में ही रहना चाहिए।
न्यायूमूर्ति एम.एम. सुंदरेश ने अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत ‘सामाजिक सुधार’ की अवधारणा की ओर इशारा करते हुए कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम जैसे विधायी हस्तक्षेप इसके दायरे में आ सकते हैं।
पीठ ने धार्मिक संदर्भों में ‘संवैधानिक नैतिकता’ को लागू करने की कठिनाई पर भी विचार किया। न्यायमूर्ति सुंदरेश ने संकेत दिया कि यह एक परिवर्तनशील अवधारणा हो सकती है, जबकि न्यायमूर्ति नागरत्ना ने धार्मिक प्रथाओं को व्यक्तिपरक तरीके से परखने के लिए इसका उपयोग करने के खिलाफ चेतावनी दी।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि गैर-सरकारी संस्थाओं पर इस तरह के मानक लागू करने से उन मामलों में एक ‘क्षैतिज अनुप्रयोग ‘ की स्थिति पैदा हो सकती है, जो पारंपरिक रूप से आस्था से संचालित होती है।
मामले की सुनवाई गुरुवार 16 अप्रैल को भी जारी रहेगी।
