उनकी स्मृतियों को भी नहीं सहेज पाए विन्ध्य के लोग
डां.संजय पयासी
सतना:प्रगति और विकास के बीच स्मृतियों को सहजने और अपने आदर्शों की पहचान को किसी न किसी रूप में कायम रखना अब आसान नहीं रह मुश्किलें पहले भी थी संसधान और इच्छाशक्ति की.कुछ जानकर खुश होगें और कुछ दुखी की अब से 94 साल पहले बापू यानी राष्ट्रपिता मोहनदास करम चन्द्र गांधी ने इसी शहर में लोगों से झोली फैलाकर मदद की गुहार लगाई थी.यह वाक्यअब शायद ही किसी के जहन में हो पर वह पीपल का पेड़ मूक गवाही के लिए आज भी मौजूद है.यह बात अलग है कि गवाह को भी खोजना पड़ेगा.
गांधी जयन्ती के अवसर पर कल यानी 2 अक्टूबर को सरकारी और गैरसरकारी तौर पर कई कार्यक्रम आयोजित होंगे,पर किसी भी कार्यक्रम में इस बात का जिक्र नहीं होगा कि बापू अपने जीवनकाल में दो बार विन्ध्य की धरती पर आ चुके हैं.काफी खोजबीन के बाद यह पता चला कि बापू पहली बार 1931के जनवरी महीने में आए थे.ऐसा स्थानीय इतिहासकारों ने अपने दस्तावेजों में उल्ल्ेाख किया है.पूर्व विधानसभा अध्यक्ष शिवानन्द जी ने अपनी पुस्तक सतना नगर:प्रारम्भ से सन् 1950 तक में 28 जनवरी 1931 को बापू का सतना आना और जनसभा को सम्बोधित करने का उल्लेख किया है.
दूसरे इतिहासकार चिन्तामणी मिश्रा ने अपनी पुस्तक मेरी बस्ती मेरे लोग में भी इसी वर्ष का उल्लेख किया है.यह बात अलग है कि इतिहास में 1931 में गांधी जी सविनय अवज्ञा आन्दोलन का आहवान कर चुके थे.इसी के साथ इसी वर्ष में गोलमेज बैठक के दौरान गांधी और इर्विन समझौता हुआ था.यह बात दूसरी है कि गांधी ने छूआछूत के खिलाफ अपना आन्दोलन 1933 में शुरू किया था.इसी के तहत उन्होने देश भ्रमण का कार्यक्रम तय किया था.सतना भी लोगों को रेलवे स्टेशन में सम्बोधित कर छूआछूत को पूरी तरह खत्म करने की अपील की थी.
साथ मदद के लिए झोली फैलाकर हरिजन (अब असंवैधानिक) फण्ड के लिए मदद मांगी थी.यह सभा तक के रेलवे इदारा के समीप पीपल के पेड के नीचे हुई थी.यह पेड अभी प्लेटफार्म क्रमांक दो के लिए बनाई गई सरगनसेनी के नीचे केंटिन के पीछे मौजूद है.बापू की दूसरी यात्रा 1942 में असहयोग आन्दोलन के समय बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय के रजत जयंती कार्यक्रम में भाग लेने के लिए मुम्बई से बनारस के लिए यात्रा करने के दौरान हुई थी.इस यात्रा में वे ट्रेन से नहीं उतरे लेकिन उनकी एक झलक पाने के लिए स्टेशन की सारी टिकटे बिक चुकी थी.पुलिस बिना टिकट किसी को अन्दर नहीं जाने दे रही थी.इसके समाधान के लिए सेठ गनपत प्रसाद लल्ला मारवाडी ने सारी टिकट खरीद कर लोगों में बांट दी थी
