नितिन नवीन
बिहार आज अपनी विकास यात्रा के एक नए मोड़ पर खड़ा है। कभी टूटी-फूटी सड़कों और कच्चे रास्तों के लिए पहचाना जाने वाला यह राज्य अब तेज़ रफ़्तार एक्सप्रेसवे और चौड़ी हाइवे की नई पहचान बना रहा है। साथ ही, केंद्र सरकार की टैक्स राहत योजनाओं से आम लोगों की जेब में ज़्यादा पैसा आ रहा है। यह दोहरी ताक़त—नई सड़कें और बढ़ती खपत—बिहार को तेज़ी से बदलते पूर्वी भारत का अगुवा बना रही है।
टैक्स में राहत, जेब में ज़्यादा पैसा
केंद्र सरकार ने 2025–26 के बजट में आयकर सीमा बढ़ाकर 12 लाख रुपये कर दी है। वेतनभोगी वर्ग को 12.75 लाख रुपये तक की राहत मिली है। इसका सीधा फायदा बिहार जैसे राज्यों को होगा, जहाँ ज़्यादातर लोग मध्यमवर्ग और निम्न-मध्यमवर्ग से आते हैं।
जब लोगों की जेब में पैसा बचेगा, तो वे ज़्यादा खर्च करेंगे। इससे बाज़ार में माँग बढ़ेगी, छोटे दुकानदारों से लेकर सेवाएँ देने वालों तक सभी को लाभ होगा। यह राहत केवल कागज़ी बदलाव नहीं है, बल्कि यह बिहार की ज़मीन पर चल रही सड़क क्रांति के साथ मिलकर राज्य की अर्थव्यवस्था को नई रफ़्तार दे रही है।
एक्सप्रेसवे: बिहार की असली तस्वीर बदलने वाले रास्ते
सड़कें किसी भी राज्य की प्रगति की सबसे बड़ी पहचान होती हैं। आज बिहार में 1.18 लाख करोड़ रुपये की लागत से पाँच बड़े एक्सप्रेसवे बनाए जा रहे हैं। इनसे सफ़र का समय आधा हो जाएगा और व्यापार, शिक्षा व रोज़गार के नए रास्ते खुलेंगे।
ये पाँच बड़े एक्सप्रेसवे हैं:
रक्सौल–हल्दिया (407 किमी): बिहार को सीधे पूर्वी बंदरगाहों से जोड़ने वाला रास्ता।
गोरखपुर–सिलीगुड़ी (417 किमी): उत्तर बिहार के लिए नेपाल और उत्तर-पूर्व भारत से जुड़ने की जीवनरेखा।
पटना–पूर्णिया (245 किमी): राजधानी को सीमांचल इलाके से सीधी कनेक्टिविटी।
बक्सर–भागलपुर (380 किमी): पश्चिम बिहार को राज्य के पूर्वी हिस्से से जोड़ने वाला एक्सप्रेसवे।
वाराणसी–कोलकाता (117 किमी बिहार हिस्सा): पूर्वी आर्थिक कॉरिडोर में बिहार की अहम भूमिका।
इन रास्तों से किसानों को अपनी फसल बड़े शहरों तक पहुँचाने में आसानी होगी। छोटे व्यापारी और ट्रांसपोर्टर अपने माल को तेज़ी से और कम खर्च में बाज़ार तक ले जा सकेंगे।
यूपी और बंगाल से अलग राह
अक्सर बिहार की तुलना उत्तर प्रदेश से की जाती है, जहाँ पुरवांचल और बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे ने ध्यान खींचा है। पर बिहार का मॉडल अलग है। यहाँ सड़क निर्माण के साथ-साथ टैक्स राहत भी दी जा रही है। यानी सड़कें भी बन रही हैं और लोगों की खरीदने की क्षमता भी बढ़ रही है।
पश्चिम बंगाल को बंदरगाहों और पुराने उद्योगों का फायदा रहा है, लेकिन सड़क विस्तार में उसकी गति धीमी रही है। अब रक्सौल–हल्दिया एक्सप्रेसवे के ज़रिए बिहार सीधे बंगाल के बंदरगाहों से जुड़ जाएगा। इससे बिहार के किसान और व्यापारी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुँच पाएँगे।
किसानों, व्यापारियों और युवाओं के लिए नए अवसर
बिहार की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। तेज़ सड़कें बनने से किसान अपनी उपज समय पर बड़े बाज़ारों तक पहुँचा पाएँगे। इससे उन्हें सही दाम मिलेगा और बर्बादी कम होगी।
व्यापारी और छोटे उद्योगपति भी अब नए उत्साह के साथ निवेश कर पाएँगे। पहले लोग कहते थे कि बिहार में सड़कें नहीं हैं, इसलिए उद्योग नहीं आते। लेकिन अब वह स्थिति बदल रही है। निर्माण कार्यों से रोज़गार के अवसर तुरंत मिल रहे हैं और एक्सप्रेसवे पूरे होने पर पर्यटन, व्यापार और सेवा क्षेत्र में भी हज़ारों नए रोजगार निकलेंगे।
निष्कर्ष: विकास की नई छलांग
बिहार अब पिछड़ेपन की छवि से बाहर निकल रहा है। जेब में पैसा बढ़ा है, सड़कें चौड़ी और तेज़ हो रही हैं, और लोग आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहे हैं। कच्चे रास्तों से लेकर एक्सप्रेसवे तक की यह यात्रा केवल ढाँचे का बदलाव नहीं है, यह सोच और आत्मविश्वास का भी बदलाव है।
अगर यही गति बनी रही, तो आने वाले सालों में बिहार सिर्फ़ पूर्वी भारत ही नहीं, बल्कि पूरे देश की विकास गाथा में सबसे आगे नज़र आएगा।
