वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में हाल ही में किए गए सुधारों को लागू हुए चार दिन हो चुके हैं. प्रारंभिक संकेत उत्साहवर्धक हैं—अधिकांश वस्तुओं की कीमतों में गिरावट आई है और आम उपभोक्ता ने राहत की सांस ली है. लेकिन यह तस्वीर पूरी तरह संतुलित नहीं है. कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां सुधारों का लाभ उपभोक्ता तक नहीं पहुंच पा रहा, और मेडिकल सेक्टर इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. दवाइयों के दाम न केवल जस के तस बने हुए हैं बल्कि कुछ निर्माताओं द्वारा जानबूझकर बढ़ोतरी करने की खबरें भी सामने आई हैं. यह स्थिति उन आम नागरिकों के लिए गहरी चिंता का विषय है जिनका स्वास्थ्य खर्च पहले ही आय का बड़ा हिस्सा निगल जाता है.भारत की औषधि उद्योग दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उद्योग है और लगभग 42 अरब डॉलर का बाजार रखता है. यहां जेनेरिक दवाओं का हिस्सा सबसे अधिक है, फिर भी उपभोक्ताओं तक सस्ती दवाइयां पहुंचना कठिन बना हुआ है. कारण है—निर्माताओं और विक्रेताओं की मनमानी तथा सरकार की निगरानी प्रणाली का कमजोर होना. यदि जीएसटी सुधार का असली फायदा उपभोक्ता को मिलना है तो केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर दवा उद्योग पर सख्त निगरानी करनी होगी. खास तौर पर यह देखना होगा कि टैक्स घटने का लाभ सीधे एमआरपी में परिलक्षित हो. मेडिकल क्षेत्र को छोड़ दें तो अधिकांश क्षेत्रों में जीएसटी सुधारों का सकारात्मक असर दिख रहा है. रसोई गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़े और फर्नीचर जैसे सामानों की कीमतों में कमी से उपभोक्ता मांग बढ़ी है. खुदरा बाजार में लेनदेन में लगभग 8-10 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है. यह एक संकेत है कि उपभोक्ता खर्च बढऩे से अर्थव्यवस्था की गति तेज हो सकती है.
भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों का सामना कर रही है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के ताज़ा अनुमान के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की विकास दर 6.5 फीसदी रहने की संभावना है, जो विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक है. अमेरिकी संरक्षणवाद और उच्च टैरिफ नीतियों के कारण वैश्विक व्यापार पर असर पड़ा है, लेकिन जीएसटी सुधारों ने घरेलू स्तर पर एक सकारात्मक माहौल तैयार किया है. यह सुधार भारत को आंतरिक उपभोग पर आधारित विकास मॉडल की ओर ले जा रहा है, जहां घरेलू मांग विदेशी दबावों का संतुलन कर सके.
जीएसटी सुधार का दूसरा बड़ा फायदा छोटे और मझोले उद्योगों (एमएसएमई) को हुआ है. टैक्स ढांचे को सरल बनाने और इनपुट टैक्स क्रेडिट को सुगम बनाने से उनकी लागत घट रही है. यदि ये लाभ उपभोक्ता तक लगातार पहुंचते रहें, तो बाजार में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी और मुनाफाखोरी की गुंजाइश कम होगी.
हालांकि यह नहीं भूलना चाहिए कि सुधार तभी सार्थक होंगे जब पारदर्शिता और निगरानी का मजबूत तंत्र खड़ा हो. यदि दवा जैसी आवश्यक वस्तुओं में उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिलेगी तो सुधार अधूरे साबित होंगे. केंद्र सरकार को “नेशनल एंटी-प्रॉफिटियरिंग अथॉरिटी” जैसे संस्थानों को और सशक्त बनाना चाहिए ताकि कोई भी उद्योग जीएसटी में कटौती का लाभ उपभोक्ताओं से छिपा न सके.
कुल मिलाकर, जीएसटी सुधारों ने अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा भरी है और उपभोक्ताओं के बीच विश्वास जगाया है. अब जिम्मेदारी सरकार की है कि वह इस भरोसे को बनाए रखे और सुनिश्चित करे कि सुधारों का लाभ हर क्षेत्र और हर नागरिक तक पहुंचे. खासकर दवा उद्योग में पारदर्शिता और सख्त नियंत्रण की दिशा में कदम उठाना अनिवार्य है. तभी जीएसटी सुधारों को वास्तविक सफलता मानी जाएगी और भारत की अर्थव्यवस्था को अपेक्षित गति मिलेगी.
