भारत का संतुलित लेकिन दृढ़ संदेश

संयुक्त राष्ट्र महासभा के 80 वें अधिवेशन में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर का भाषण भारत की बदलती अंतरराष्ट्रीय भूमिका और आत्मविश्वास का प्रतीक बनकर उभरा. यह संबोधन केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि उस भारत का घोषणापत्र था जो अब वैश्विक मंच पर श्रोता नहीं, बल्कि नीति-निर्माता और निर्णायक भागीदार बनना चाहता है. जयशंकर ने अपने भाषण में स्पष्ट कहा कि आज की बहुध्रुवीय दुनिया में संयुक्त राष्ट्र की संरचना पुरानी हो चुकी है. सुरक्षा परिषद का ढांचा 1945 का है, जबकि दुनिया 2025 में पहुंच चुकी है. ऐसे में भारत सहित एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की उपेक्षा अब अस्वीकार्य है.भारत ने यह तर्क पेश किया कि जब वह जी-20 में नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है, तो उसे संयुक्त राष्ट्र की निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखना वैश्विक लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है. यह संदेश उन देशों के लिए चेतावनी भी था जो सुधारों की बात तो करते हैं, लेकिन पहल से कतराते हैं.

विदेश मंत्री ने भारत के ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज़ बनने की भूमिका को रेखांकित किया. अफ्रीकी यूनियन को जी-20 में शामिल कराने की पहल इसका उदाहरण है.इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति, समुद्री सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ साझा मोर्चे पर भारत ने अपनी प्राथमिकता स्पष्ट की. खासकर आतंकवाद पर जयशंकर ने कहा कि कोई भी राजनीतिक या वैचारिक कारण निर्दोषों की हत्या को वैध नहीं बना सकता. यह पाकिस्तान और उसके संरक्षकों को सीधा संदेश था. दरअसल, भाषण की सबसे बड़ी ताकत इसका संतुलन था. रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इजरायल-फलस्तीन संघर्ष, भारत ने किसी पक्षधरता से बचते हुए संवाद और कूटनीति को ही समाधान बताया.भारत ने यह भी याद दिलाया कि मानवता का संकट सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं है—जलवायु परिवर्तन, खाद्य असुरक्षा और गरीबी भी उतने ही गंभीर खतरे हैं. यह दृष्टिकोण विकासशील देशों के लिए उम्मीद और पश्चिमी शक्तियों के लिए आत्ममंथन का संदेश था. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने वैश्विक संकटों में “समस्या का हिस्सा” नहीं बल्कि “समाधान का हिस्सा” बनने की नीति अपनाई है. कोविड वैक्सीन आपूर्ति, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का अनुभव साझा करना और जी-20 की सफल मेजबानी इस छवि को मजबूत करते हैं.संयुक्त राष्ट्र में जयशंकर का भाषण उसी रुझान को आगे बढ़ाता है—एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में भारत की पहचान. कुल मिलाकर 80 वें अधिवेशन में भारत की आवाज़ आत्मविश्वास से भरी और रचनात्मक रही. यह भाषण उस नए अध्याय का संकेत है जिसमें भारत न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करता है बल्कि वैश्विक चुनौतियों के समाधान में भी नेतृत्वकारी भूमिका निभाने को तैयार है.अब सवाल यह है कि क्या विश्व समुदाय भारत की इन स्पष्ट मांगों को केवल सुनकर तालियाँ बजाएगा या सचमुच संयुक्त राष्ट्र सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाएगा.

 

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