सागर: रानगिर की मां हरसिद्धि की ख्याति दूर दूर तक फैली है. मां के दर पर आने वाले मे श्रद्धालुओं की हर मनोकामना पूरी होती है.यहां पर हर दिन अनेक श्रद्धालुओं का आना होता है लेकिन साल की दोनो नवरात्रि पर हजारों श्रद्धालु मां के दर्शन कर प्रसाद, भेट चढ़ाते हैं तथा मां के दरबार में अनुष्ठान करते है. श्रद्धालुओं का जन सैलाब तो नवरात्रि और सभी प्रमुख तीज त्यौहार पर उमड़ता है लकिन नवरात्रि पर यहां विशाल मेला लगता है जिसमें सागर जिला सहित पूरे मध्यप्रदेश और प्रदेश के बाहर तक के श्रद्धालु रानगिर आते हैं और मां के दरबार में मनौती मांगते है.
कुछ श्रद्धालु जहां मनौती लेकर आते हैं वही कई श्रद्धालु मनौती पूरी होने पर मां के दरबार में हाजिरी लगाते है. कहा जाता है कि सच्चे मन से मां हरसिद्धि के सामने जो भी कामना की जाती है वह पूरी हो जाती है और मां के भक्त इसी आशा और विश्वास से मां के दरबार में दौडे चले आते हैं और मां भी अपने भक्तो की मनोकामना पूरी करती हैं. रानगिर में विराजित मां की लीला अपरंपार है. दिन मे तीन प्रहरों में मां तीन रूप में दर्शन देती हैं।
सूर्य की प्रथम किरणों के समय मां बाल रूप में दर्शन देती हैं तो दोपहर बाद युवा रूप में एवं शाम के वृद्धा दर्शन देती हैं. परिवर्तित हेने वाले मां की छवि में श्रद्धालु अपने आस्था और श्रद्धा मां के चरणो मे समर्पित कर धन्य हो जाते हैं. मां महिमा अपरंपार हैं भक्त जो भी मनोकामना लेकर आते हैं मां उसे अवश्य ही पूर्ण करती हैं, मां की यह प्रतिमा अति प्राचीन है. प्रतिमा के साथ छोटी मूर्ति भी बनी हुई है जो किसी सेवक के लिए इंगित करती है.
हरसिद्धि का भावार्थ पार्वती देवी ही है, हर का अर्थ महादेव और सिद्धि का अर्थ प्राप्ति है. 1732 मे सागर प्रदेश का रानगिर परगना मराठों की राजधानी था, जिसके शासक पंडित गोविंद राव थे. वर्तमान मंदिर पंडित गोविंदराव का निवास परकोटा था. 1760 मे पंडित गोविंद राव की मृत्यु के बाद यह स्थल खण्डहर मे बदल गया, इसी खंडहर के बीच एक चबूतरा था कुछ सालों बाद इसी चबूतरे पर मां हरसिद्धि देवी जी की मूर्ति स्थापित की गई.
