इंदौर के एमवायएच अस्पताल में चूहों द्वारा नवजातों को कुतरने की घटना ने न केवल मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. यह घटना स्वास्थ्य तंत्र की भयावह लापरवाही की मिसाल है. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने स्वत: संज्ञान लेकर सरकार से जवाब तलब किया है. अदालत का यह कदम बेहद आवश्यक था, क्योंकि यह मामला केवल अस्पताल प्रबंधन की चूक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में व्याप्त गहरी उदासीनता और जवाबदेही की कमी को उजागर करता है.
यह तथ्य बेहद चिंताजनक है कि राज्य स्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट में जिस प्रकार लापरवाही सामने आई, वह अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाती है. एमवायएच जैसे प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल में न तो रोडेंट कंट्रोल कमेटी की बैठकें होती थीं, न ही इंफेक्शन कंट्रोल कमेटी सक्रिय थी. यह सीधे-सीधे उस व्यवस्था की विफलता है, जो मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई थी. नवजात शिशुओं जैसे संवेदनशील मरीजों को चूहों से सुरक्षित न रख पाना चिकित्सा तंत्र की असंवेदनशीलता का चरम है.
सरकार ने जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करते हुए विभागाध्यक्षों को हटाने, प्रभारी डॉक्टर को निलंबित करने और पेस्ट कंट्रोल कंपनी एजाइल का अनुबंध समाप्त करने के निर्देश दिए हैं. यह कदम स्वागतयोग्य हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल अनुबंध निरस्त कर देने या डॉक्टरों को हटाने भर से समस्या का समाधान होगा ? असलियत यह है कि अस्पतालों में सिस्टमेटिक निगरानी, जवाबदेही और पारदर्शिता की संस्कृति विकसित किए बिना ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोक पाना संभव नहीं है.
एमवायएच में पेस्ट कंट्रोल का काम एजाइल कंपनी को सौंपा गया था, लेकिन उसकी लापरवाही उजागर हुई है.यहां ठेकेदारी व्यवस्था की खामियां भी सामने आती हैं. कंपनियां केवल औपचारिकता निभाती हैं और अस्पताल प्रशासन आंखें मूंद लेता है. जब तक अस्पताल प्रबंधन स्वयं सक्रिय भूमिका नहीं निभाएगा, बाहरी कंपनियों के भरोसे मरीजों की सुरक्षा संभव नहीं.
इस घटना ने राजनीतिक प्रतिक्रिया भी उत्पन्न की. बहरहाल, घटना का एक और गंभीर पहलू यह है कि एमवाय अस्पताल अधीक्षक डॉ. अशोक यादव घटना के बाद अचानक 15 दिन की छुट्टी पर चले गए. यह कदम सवाल खड़े करता है कि क्या यह केवल स्वास्थ्य कारणों से हुआ या जिम्मेदारी से बचने का प्रयास है ? किसी भी आपात स्थिति में नेतृत्व का दायित्व बढ़ जाता है, और छुट्टी पर जाना जिम्मेदारी से भागने जैसा प्रतीत होता है.
एमवायएच प्रकरण यह भी दर्शाता है कि हमारे अस्पतालों में प्रशासनिक बैठकों और समितियों को महज कागज़ी खानापूर्ति मान लिया गया है. रोडेंट कमेटी और इंफेक्शन कंट्रोल कमेटी की बैठकें यदि नियमित रूप से होतीं, तो शायद यह भयावह हादसा टल सकता था. यह केवल एक अस्पताल की समस्या नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की मानसिकता का प्रतिबिंब है.
अब सवाल यह है कि आगे क्या ? सरकार को चाहिए कि वह केवल दोषियों को दंडित कर इतिश्री न करे, बल्कि अस्पतालों में जवाबदेही तय करने के लिए एक ठोस निगरानी तंत्र स्थापित करे.सभी अस्पतालों में पेस्ट कंट्रोल और इंफेक्शन कंट्रोल पर सख्त मॉनिटरिंग हो, बैठकों के मिनट्स ऑनलाइन दर्ज हों और उनकी समीक्षा उच्च स्तर पर की जाए. साथ ही, अस्पतालों में रोगी सुरक्षा को लेकर जागरूकता अभियान भी चलाना होगा.
एमवायएच प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि स्वास्थ्य तंत्र आत्मसंतुष्टि और ढिलाई में डूबा रहा, तो मरीजों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही रहेगी. यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की हत्या है. अदालत के हस्तक्षेप से इस मामले में कठोर जवाबदेही सुनिश्चित हो, यही समाज की अपेक्षा है.सरकार को अब यह साबित करना होगा कि वह केवल संकट टलने तक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सुधार की दिशा में गंभीर है.
