पटवारी ताकत दिखा रहे, बड़े नेताओं को लड़ने से फुर्सत नहीं


हरीश दुबे
विधानसभा चुनाव में अभी तीन बरस से कुछ ज्यादा वक्त है लेकिन चंबल में कांग्रेस अभी से जोर दिखा रही है। आज बुधवार का दिन भिंड और दतिया में कांग्रेस के नाम रहा। जीतू पटवारी ने इन दोनों ही शहरों में “वोटचोर गद्दी छोड़” सत्याग्रह का नेतृत्व कर जतला दिया कि पार्टी में सब कुछ ठीक चला तो चुनावी वर्ष तक ऐसी ही सक्रियता बनी रहेगी लेकिन प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के बीच जिस तरह जुबानी जंग चल रही है और अभी तक अंत:वीथिकाओं में रहे मतभेद जिस तरह सतह पर आ गए हैं, उसे देखकर लगता है कि आने वाले वक्त में प्रदेश के मुख्य प्रतिपक्षी दल में छत्रपों की गुटबाजी और ज्यादा गहरा सकती है।

आज ग्वालियर संभाग की सीमा में प्रवेश करने के साथ ही पटवारी भले ही जयवर्धन सिंह को अपना भाई बताकर और उनकी वरिष्ठता को स्वीकार कर माहौल को सामान्य बनाने की कोशिश करें लेकिन यह सच है कि प्रदेश की कांग्रेस राजनीति में दिग्विजय के स्वाभाविक उत्तराधिकारी माने जा रहे जयवर्धन को एक जिले की अध्यक्षी संभालने तक सीमित करना न राजा के समर्थकों के गले उतर रहा है और न पार्टी के साधारण कार्यकर्ताओं को। बावजूद इसके, कांग्रेस के नेता आज की रैलियों में उमड़ी भीड़ से उत्साहित हैं। भिंड के दोनों नए जिलाध्यक्षों ने अपने स्वागत जुलूस में भारी भीड़ जोड़कर चंबल के हलकों में पार्टी की नई उम्मीदें जगा दी हैं।

माननीय के इन तेवरों के पीछे कुछ तो बात है…

बात चंबल की ही। भिंड सदर के विधायक किसानों के खाद संकट के मुद्दे पर इस कदर आक्रामक होकर अपनी ही सरकार के प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल लेंगे और कलेक्टर के बंगले के बाहर ही तंबू गाड़ कर बैठ जाएंगे, इसकी उम्मीद उनके खास नजदीकियों को भी नहीं थी। किसानों से बात करने से इंकार करने वाले कलेक्टर से विधायक महोदय का जिस चंबल शैली में संवाद हुआ, उसकी मिशाल भिंड के इतिहास को खंगालने पर पिछले दस बीस बरस में तो नहीं मिलती।

तीस पैंतीस बरस पहले का एक वाकया जरुर ताजा हो गया जब कांग्रेस के एक पुराने नेता खिजर मौहम्मद कुरैशी ने ऐसे ही एक विवाद में तत्कालीन कलेक्टर को चांटा जड़ दिया था। बहरहाल, आज के घटनाक्रम ने यह जरूर साफ कर दिया कि भिंड सदर के विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह अपनी ही पार्टी के राज में प्रशासन के हिटलरी रवैए से नाराज हैं। नरेंद्र कुशवाह कई बार के विधायक हैं, इस बार मंत्री पद पर दावा और वादा था जो पूरा नहीं हुआ।

शिवराज का ग्वालियर आना…

भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की अटकलों के बीच संघ प्रमुख से लंबी मुलाकात के दूसरे ही रोज शिवराज सिंह के ग्वालियर दौरे से अंचल की राजनीति गरमा गई। वे जब मुख्यमंत्री थे, उस वक्त ग्वालियर पर उनका खास फोकस रहता था। 2018 में सत्ता से उतरने के सवा साल बाद ही सत्ता में वापसी कराने में भी ग्वालियर की ही केंद्रीय भूमिका रही थी। बहरहाल, भोपाल छोड़कर सेंट्रल की राजनीति में जाने के बाद से ही उनके ग्वालियर दौरे कम हो गए हैं। इस बार वे अर्से बाद गालव नगरी में आए, ग्वालियर से दतिया तक खूब भीड़ उमड़ी। एक नेता ने पूछ ही लिया कि क्या हम भावी राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वागत कर रहे हैं, इस सवाल पर शिवराज हाथ ही जोड़ सकते थे और उन्होंने वही किया…!

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