जम्मू-कश्मीर में माता वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा पर निकले श्रद्धालुओं के लिए हाल ही में आई भूस्खलन की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है. भारी बारिश से हुए इस हादसे में कई तीर्थयात्रियों की मौत हो गई और कई लोग घायल हुए. बचाव दल ने तुरंत मोर्चा संभाला, लेकिन प्रकृति के इस क्रोध ने एक बार फिर हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हम हिमालयी क्षेत्रों में विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन साध पा रहे हैं ?
दरअसल, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य आज तीव्र विकास और बढ़ती आबादी का दबाव झेल रहे हैं. सडक़, सुरंग, होटल, हाइड्रो प्रोजेक्ट और धार्मिक पर्यटन की सुविधाओं ने पहाड़ों को लगातार खोखला किया है. परिणामस्वरूप जरा-सी बारिश या भूकंपीय हलचल बड़े हादसों का कारण बन जाती है. वैष्णो देवी के मार्ग पर हुआ भूस्खलन अपवाद नहीं, बल्कि उस संकट का हिस्सा है जो लंबे समय से चेतावनी देता आ रहा है. हिमालयी क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से बहुत युवा और नाजुक माने जाते हैं. यहां पर प्राकृतिक संतुलन जरा-सा बिगड़ते ही आपदा का रूप ले लेता है. बारिश से पहाड़ों का कटाव बढ़ता है और अनियंत्रित निर्माण कार्य इसे और भयावह बना देता है. वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी देते रहे हैं कि पर्वतीय इलाकों में निर्माण कार्य सीमित और संतुलित होना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्यवश, विकास की अंधी दौड़ में हम इन चेतावनियों को नज़र अंदाज़ कर रहे हैं. वैष्णो देवी, केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ जैसे तीर्थस्थल हर साल लाखों लोगों को आकर्षित करते हैं. इतने बड़े पैमाने पर यात्रियों के आगमन के लिए बुनियादी ढांचे की जरूरत तो है, लेकिन यह आवश्यकता पहाड़ों की सहनशक्ति से अधिक नहीं होनी चाहिए. अधिक सडक़ चौड़ीकरण, होटल निर्माण और सीमेंट-कंक्रीट पर आधारित ढांचों से पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुंच रहा है. अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर एक विशेषज्ञ समिति का गठन करें. यह समिति भूगर्भशास्त्रियों, पर्यावरणविदों, इंजीनियरों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों से मिलकर बने. इसका मुख्य काम होगा,पर्वतीय इलाकों में चल रहे निर्माण कार्यों की निगरानी,तीर्थ और पर्यटन मार्गों के लिए वैज्ञानिक दृष्टि से सुरक्षित बुनियादी ढांचे का सुझाव देना, आपदा जोखिम मूल्यांकन और समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट करना,स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करना. दरअसल,हमारी नीतियों में यह साफ होना चाहिए कि विकास का अर्थ केवल सडक़ें, होटल और बिजलीघर खड़ा करना नहीं है. असली विकास वही है जो प्रकृति और समाज दोनों के अनुकूल हो.यदि हम पहाड़ों को असुरक्षित बना देंगे तो वहां का पर्यटन और धार्मिक आस्था दोनों ही खतरे में पड़ जाएंगे. कुल मिलाकर
वैष्णो देवी हादसा केवल एक दुखद घटना नहीं, बल्कि एक सख्त चेतावनी है. हमें यह समझना होगा कि पहाड़ों के विनाश की कीमत पर विकास नहीं हो सकता. यदि हम समय रहते नहीं चेते तो आने वाली पीढिय़ां हमें माफ नहीं करेंगी. इसलिए अब जरूरी है कि हिमालयी राज्यों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए. विशेषज्ञ समिति का गठन इस दिशा में पहला कदम हो सकता है. हमारे पहाड़ ईश्वरीय वरदान हैं.जाहिर है प्रकृति और श्रद्धा, दोनों का सम्मान करना ही हमारे लिए सच्चा धर्म और दायित्व है.
