सडक़ें ही असली समृद्धि की राह

जबलपुर में राज्य के सबसे लंबे फ्लाईओवर का लोकार्पण केवल एक आधारभूत ढांचा परियोजना का उद्घाटन नहीं है, बल्कि यह उस दिशा का संकेत है जिसमें मध्य प्रदेश आने वाले वर्षों में बढऩे जा रहा है. वीरांगना रानी दुर्गावती के नाम पर बने इस 7 किलोमीटर लंबे फ्लाईओवर ने न केवल यातायात की दशा सुधारने का कार्य किया है, बल्कि यह प्रदेश की विकासशील आकांक्षाओं का प्रतीक भी है.यह महाकौशल की अर्थव्यवस्था, व्यापार और पर्यटन की गति को नई दिशा देगा.

आज जब भारत विकसित भारत का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब सडक़ और परिवहन का नेटवर्क विकास की रीढ़ बन चुका है. नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा जबलपुर में की गई घोषणाएं इसी दृष्टि को सामने रखती हैं. भोपाल-जबलपुर ग्रीनफील्ड हाईवे, टाइगर कॉरिडोर, नई राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं और रोपवे, ये सब मिलकर शहरी बल्कि ग्रामीण और आदिवासी अंचलों तक विकास की रोशनी पहुंचाएंगे.यह तथ्य बार-बार सिद्ध हुआ है कि जहां सडक़ें मजबूत होती हैं, वहां उद्योग-धंधों के लिए अवसर स्वत: पैदा होते हैं. अच्छी सडक़ें कच्चे माल से लेकर तैयार माल तक की आवाजाही को आसान करती हैं. मध्य प्रदेश का भौगोलिक स्वरूप उसे औद्योगिक हब बनने की पूरी क्षमता देता है, लेकिन अक्सर खराब कनेक्टिविटी उद्योगों की राह में रोड़ा बनती रही है. जब ग्रीनफील्ड हाईवे भोपाल-जबलपुर को जोड़ेगा, तो यह न केवल दो बड़े शहरों के बीच औद्योगिक गलियारे का निर्माण करेगा, बल्कि छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों के व्यापार को भी नई पहचान देगा. ग्वालियर-भिंड जैसी परियोजनाओं का महत्व इसी कारण और बढ़ जाता है. ये क्षेत्र खनिज, कृषि और ऊर्जा संसाधनों से समृद्ध हैं.बेहतर सडक़ें वहां से संसाधनों को बाजार तक पहुंचाने की राह को आसान करेंगी. प्रदेश का लगभग एक-तिहाई भूभाग आदिवासी क्षेत्रों से घिरा है.मंडला, डिंडोरी, शहडोल, अलीराजपुर, झाबुआ, बालाघाट, खरगोन जैसे जिले लंबे समय से “विकास की मुख्यधारा” से पीछे छूटे रहे हैं. यहां की समस्याएं केवल आर्थिक नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक भी हैं.

सडक़ें इन इलाकों की किस्मत बदल सकती हैं. अच्छी सडक़ें आदिवासी युवाओं को शिक्षा और रोजगार के बेहतर अवसरों तक पहुंचाएंगी. स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सडक़ें ही जीवनरेखा बनती हैं,गर्भवती महिलाओं या गंभीर मरीजों को गांव से शहर तक लाने का काम सडक़ें ही करती हैं.पर्यटन और स्थानीय कला-हस्तशिल्प को भी सडक़ें बड़े बाजार से जोड़ सकती हैं. यदि सरकार सचमुच विकास को “समावेशी” बनाना चाहती है, तो आदिवासी क्षेत्रों में सडक़ नेटवर्क का विस्तार उसकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.टाइगर कॉरिडोर परियोजना का महत्व भी यहीं रेखांकित होता है. कान्हा, बांधवगढ़, पन्ना और पेंच टाइगर रिजर्व न केवल जैव विविधता का प्रतीक हैं, बल्कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मध्य प्रदेश की पहचान भी हैं. यदि ये सडक़ नेटवर्क से मजबूती से जुड़ेंगे, तो पर्यटन उद्योग को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा, रोजगार बढ़ेंगे और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी. लेकिन इस विकास में पर्यावरणीय संतुलन भी अनिवार्य है. सडक़ें जंगलों को खंडित न करें, बल्कि वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए पारिस्थितिकी तंत्र के अनुरूप बनाई जाएं.मध्य प्रदेश को यदि “देश का विकास इंजन” बनना है, तो उसके लिए सडक़ नेटवर्क को और अधिक समावेशी और दूरगामी बनाना होगा. केवल शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों को जोडऩा पर्याप्त नहीं है. वास्तविक विकास तभी संभव होगा जब आदिवासी अंचल, सीमावर्ती इलाके और ग्रामीण कस्बे भी इस नेटवर्क से मजबूती से जुड़े. सडक़ें केवल रास्ते नहीं होती, वे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और समृद्धि की सीढ़ी होती हैं.

 

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