
( लक्ष्मीकांत ढोके) पांढुरना।
पांढुरना नगर में सदियों से चली आ रहीं परंपरा के अनुसार कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन अर्थात महाराष्टरीयन कृषकों के पोला त्यौहार के दुसरे दिन मनाये जाने वाला विश्व विख्यात गोटमार मेला कई शंकाओं को जन्म देता है। इस अद्ïभूत गोटमार मेले के बारे में कोई इतिहास संबंध विवरण उपलब्ध नहीं है। मराठी भाषा में गोटमार का अर्थ पत्थर मारना होता है। वाकई इस मेले में पत्थरबाजी की जाती है इसमें कोई दो या चार लोग दो या चार घंटे नहीं बल्कि हजारों लोग सूर्योदय से सूर्यास्त तक विपक्षी योद्धाओं पर पत्थर रूपी शस्त्रों से बौछार कर बड़ी शान से एक-दूसरे का लहू बहाते है। इस एक दिवसीय युद्ध में प्रतिवर्ष अनगिनत लोग इस पत्थर रूपी शस्त्रों से घायल हो जाते है तो कई अपने प्राणों से भी हाथ धो बैठते है। पर जगत जननी माँ चंडिका के भक्तों द्वारा इस मेले को बंद कराने में कई बाधाओं के आने पर भी अनवरत रूप से परंपरागत ढंग से इस मेले का संपन्न कराने की परिपाठी चली आ रहीं है।
प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी यह विश्व प्रसिध्द गोटमार मेला महाराष्ट्रीयन कृषकों के पोला त्यौहार के दुसरे दिन अर्थात 23 अगस्त 2025 को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जायेगा। सदियों से मनाते चले आ रहे इस गोटमार मेले के आयोजन के संबंध में अनेकों किवदंतियां प्रचलित है ।
एक अन्य प्रचलित मान्यता के अनुसार अति प्राचीन काल में पांढुरना नगर का एक युवक सावरगांव की एक युवती पर मोहित हो गया और धिरे-धिरे इनका सम्मोहन प्रेम में बदल गया। परंतु इन दोनों के प्रेम प्रसंग को विवाह बंधन में बदलने के लिए कन्या पक्ष के लोग राजी नहीं हुए अत:आतुर युवक ने अपनी प्रेमिका को अपना जीवन साथी बनाने के लिए भाद्रपद अमावस्या के दिन अर्थात कृषकों के पोले त्यौहार के दूसरे दिन प्रात:काल में सावरगांव से भगाकर पांढुरना लाने का प्रयत्न किया किन्तु रास्ते में स्थित जाम नदी के पानी रूपी अवरोध को पार करते समय जब यह बात सावरगांव वालों को मालूम हुई तो उन्होंने इसे अपनी प्रतिष्ठा पर आघात समझ कर लड़के पर पत्थरों की बौछार कर दी। जैसे ही वर पक्ष पांढुरना वालों को यह खबर हुई तो उन्होंने लडके के बचाव के लिए पत्थरों की बौछार शुरू कर दी । पांढुरना पक्ष एवं सावरगांव पक्ष के बिच इस पत्थरों की बौछारों से इन दोनों प्रेमियों की मृत्यु इस जाम नदी के बीच में ही हो गयी। सावरगांव पक्ष एवं पांढुरना पक्ष के लोग जगत जननी माँ चंडिका के परम भक्त थे इसी कारण दोनों प्रेमियों की मृत्यु के पश्चात दोनों पक्षों के लोगों ने अपनी शर्मिंदगी मानकर इन दोनों प्रेमियों के शवों को उठाकर किले पर स्थित माँ चंडिका के दरबार में ले जाकर रखा और पूजा-अर्चना करने के बाद इन दोनों प्रेमियों का अंतिम संस्कार कर दिया गया ।
संभवत: इसी घटना की याद में माँ चंडिका की पूजा अर्चना कर गोटमार मेले के मनाये जाने की परिपाटी चली आ रहीं है । सावरगांव पक्ष वालों की लड़की होने के कारण नदी के बिचों-बिच सावरगांव वाले झंडे के रूप में पलाश वृक्ष गाड देेते है एवं पांढुरना पक्ष वालों का लडका होने के कारण नदी के बीच में गड़े पलाश वृक्ष रूपी झंडे को लाकर जगत जननी माँ चंडिका के मंदिर में अर्पित कर देते है ।
वहीं दूसरी किवदंती के अनुसार ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में प्रवेश करने के बाद इस स्थान पर तैनात अंग्रेज छावनी के कमांडिंग आफिसर द्वारा इसे मेले को अपनी आंखों से देख कहा (इट इज ए गोटमार) तभी से यह मेला गोटमार मेले के रूप में प्रख्यात हो गया। लेकिन उक्त कमांडिंग आफिसर ने उस समय के मांडलिक राजाओं से इस पर्व को नये आयाम देने का सुझाव दिया जिससे नाराज होकर कुछ लोगों ने उनकी हत्या कर दी। जिसकी समाधी आज भी सावरगांव के अंतिम छोर पर कंपनी का मंदिर के नाम से जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। कुल मिलाकर गोटमार की परंपरा का कोई भी विश्वसनीय एवं अधिकृत उद्ïभव के आधार पर किसी को ज्ञात नहीं है । सर्व धर्म समभाव :- 000
यह मेला नगर के मध्य से प्रवाहित होने वाली जाम नदी के किनारे स्थित हिन्दू धर्म प्रेमियों के राधा कृष्ण भगवान के मंदिर तथा यहां से मात्र 100 गज की दूरी पर मुस्लिम धर्म प्रेमियों की मस्जिद के पास वाले हिस्से में लगता है। यह गोटमार मेला सभी धर्म जाति एवं संप्रदाय के लोगों द्वारा आपस में मिलकर मनाया जाता है। इस युद्ध के मैदान में न कोई मुसलमान होता है और न सिख ना इसाई। सभी अपने-अपने पक्ष में साहसी एवं पराक्रमी दिखाई देते है,किसी भी योध्दा में बदले की भावना नहीं होती। हर कोई योद्धा घायल योद्धा को चिकित्सालय तक उपचार हेतू ले जाता है ।
शाम 6 बजे तक पांढुरना पक्ष वाले योध्दा पलाश वृक्ष रूपी झंडे को काटकर गगनभेदी नारों से मां चंडिका का जयघोष करते हुए किले पर स्थित मां चंडिका के मंदिर में ले जाकर पूजा-अर्चना कर पलाश वृक्ष के झंडे को मां के चरणों में अर्पित कर देते है । और इसी के साथ गोटमार मेला समाप्त हो जाता है।
गोटमार मेले का भयावान रूप :-
गोटमार मेले में सावरगांव तथा पांढुरना पक्षों के लोगों में एक-दूसरे पर आमने-सामने से होने वाली पत्थरबाजी में प्रतिवर्ष हजारों लोग घायल हो जाते है तो कई लोगों जीवनभर के लिए विकलांग हो जाते है,किसी की आंख फूटती है,किसी का सिर तो किसी का जबड़ा टूट कर दांत गिरते है। किसी के हाथ पैर की तथा सीने की हड्डियां टूटती है,तो कई लोग समय के पूर्व ही मौत के ग्रास बन जाते है ।
उल्लेखनीय हो कि सन् 1955 में महादेवराव सांबारे 50, सन् 1979 में राकेश तायवाडे 45, सन् 1978 में देवराव सकरर्डे 40,सन् 1985 में मोती राजा खरे सन्ï 1987 में कोठीराम सांबारे 25, सन् 1989 में गोपाल चन्ने 24, सन्ï 1989 में योगिराज चौरे शिक्षक 22, सन्ï 1989 में विठठल तायवाडे 44, सन्ï 1989 में सुधाकर हापसे 27, सन्ï 2004 में रवि गायकी 32, सन्ï 2006 में जनार्धन सांबारे,सन् 2008 में गजानन पिता शामराव घुघुसकर,सन् 2011 में देवानंद पिता गणपत वघाले,वर्ष 2018 में ग्राम बेलगांव भूयारी में रहने वाले शंकर पिता झिंगू भलावी 23 की मौत हुई है,नगर के गुरूदेव वार्ड निवासी सुदामा लेंड़े वर्ष 2023 में गोटमार मेले में मौत हुई थी ।
दो बार हो चुकी है गोटमार मेले में पुलिस फायरिंग:-
गोटमार मेले में अशांति फैलने पर सन्ï 1978 में तथा सन्ï 1987 में दो बार पुलिस फायरिंग हुई थी जिसमें दो व्यक्तियों को मौत हुई थी ।
