राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का इंदौर में दिया गया संबोधन न केवल वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों का विश्लेषण है, बल्कि आने वाले समय के लिए एक स्पष्ट वैचारिक मार्गदर्शन भी है. उन्होंने चेताया कि मनुष्य को केवल उपभोग की वस्तु मानने वाली भौतिकवादी सोच ने यूरोप की आत्मा को खोखला कर दिया, और अब यही सोच भारत की पारिवारिक व सामाजिक संरचना को भी तोडऩे में सक्रिय है. यह चेतावनी महज़ एक विचार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की सुरक्षा का आह्वान है.
डॉ. भागवत ने इंग्लैंड में 2021 में आयोजित “डिस्मेंटलिंग हिन्दुत्व” सेमिनार का संदर्भ देकर स्पष्ट किया कि यह कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वैचारिक युद्ध है.
इसके पीछे विश्व के 50-60 प्रभावशाली कॉर्पोरेट घराने हैं, जिनका उद्देश्य भारत की सामाजिक एकता को खंडित कर, यहां के विशाल बाजार पर कब्ज़ा करना है. यह रणनीति उसी तरह की है, जैसी औपनिवेशिक युग में ‘डिवाइड एंड रूल’ के तहत अपनाई गई थी. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज भी वैचारिक उपनिवेशवाद सक्रिय है,जहां आर्थिक लाभ के लिए सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने के अभियान चलाए जाते हैं.
भारत के लिए यह चुनौती इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यहां धर्म और राष्ट्र एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं. धर्म यहां केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है.एक ऐसी समग्र दृष्टि जो व्यक्ति, परिवार, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करती है. डॉ. भागवत ने स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों का उल्लेख कर यह स्मरण दिलाया कि सच्चा राष्ट्रवाद जात-पात के ऊपर उठकर, सबको एकसूत्र में बांधने से ही सशक्त होता है.
उनका यह आग्रह कि कमजोर समाज के उत्थान के लिए सभी जातियों को सामूहिक प्रयास करना चाहिए, केवल सामाजिक न्याय का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का भी आधार है. आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को ऊपर उठाना राष्ट्र को भीतर से मजबूत करता है,क्योंकि विभाजित समाज किसी भी बाहरी दबाव का सामना नहीं कर पाता.
इंदौर की सद्भाव बैठक से यह भी स्पष्ट है कि संघ इस वैचारिक चेतावनी को केवल भाषण तक सीमित नहीं रख रहा, बल्कि नवंबर में तहसील स्तर तक बैठकों के जरिए सामाजिक समरसता का आंदोलन खड़ा करने की दिशा में ठोस कदम उठा रहा है. यह मॉडल यदि व्यापक स्तर पर लागू होता है, तो यह भारत की सांस्कृतिक सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता की भी गारंटी बन सकता है. वैश्विक संदर्भ में देखें तो यूरोप और अमेरिका जैसे समाज, जहां उपभोगवाद ने पारिवारिक मूल्यों को पीछे छोड़ दिया, आज जनसंख्या संकट, मानसिक अवसाद और सामाजिक विघटन से जूझ रहे हैं. वहीं, भारत की ताकत उसकी सामुदायिकता, संयुक्त परिवार प्रणाली और सांस्कृतिक तारतम्य में है.यदि हमने इन्हें संभालकर रखा, तो न केवल वैचारिक उपनिवेशवाद की चुनौती का सामना कर पाएंगे, बल्कि आने वाले दशकों में एक सांस्कृतिक महाशक्ति के रूप में भी उभरेंगे.
डॉ. मोहन भागवत का संदेश हमें यही याद दिलाता है—भारत की असली शक्ति उसके मंदिरों, बाजारों या संसद भवन में नहीं, बल्कि उन घरों और मोहल्लों में है, जहां लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होते हैं. यही समरसता हमारी असली रक्षा-कवच है, और यही भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी.
