प्रधानमंत्री जनधन योजना ने 10 वर्षों में वह कर दिखाया है जिसे कभी नामुमकिन समझा जाता था—भारत के करोड़ों वंचित और आर्थिक रूप से पिछड़े नागरिकों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोडऩा. संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत ताज़ा आंकड़ों ने इस उपलब्धि को और अधिक सशक्त रूप से रेखांकित किया है—55 करोड़ से अधिक जनधन खाते, ?2.5 लाख करोड़ से अधिक जमा राशि और 56 फीसदी से अधिक महिला खाताधारक. यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है, बल्कि यह उस परिवर्तनशील सोच का प्रतीक है जो ‘सबका साथ, सबका विकास’ की भावना से प्रेरित होकर वित्तीय समावेशन को सामाजिक न्याय की प्राथमिक सीढ़ी बनाती है.
किसी गरीब के लिए बैंक खाता केवल पैसों का ठिकाना नहीं होता, वह उसके आत्मसम्मान का प्रमाण बनता है. यह खाता उसे सीधे सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाता है, बिचौलियों की भूमिका खत्म करता है और नकद रहित लेनदेन को आसान बनाता है. मनरेगा की मज़दूरी हो या प्रधानमंत्री आवास योजना की किस्त, गैस सब्सिडी हो या किसान सम्मान निधि—हर राशि सीधे उसके खाते में पहुंच रही है. यह वित्तीय आत्मनिर्भरता गरीब को नौकरी का मोहताज नहीं, विकल्पों का स्वामी बनाती है.
यह उल्लेखनीय है कि जनधन खातों में 56 फीसदी से अधिक महिलाएं हैं. इससे ग्रामीण भारत की महिलाएं न केवल बचत की ओर प्रेरित हुई हैं, बल्कि घर के बजट में उनकी निर्णायक भूमिका भी सशक्त हुई है. पहले जहां महिला अपनी बचत घर की संदूक में छिपाकर रखती थी, अब वह डिजिटल बैंकिंग की दुनिया में प्रवेश कर चुकी है. केवाईसी अभियान एक दूरदर्शी पहल है. यह सुनिश्चित करेगा कि पुराने खातों में सक्रियता बनी रहे और योजनाओं का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचे. अब तक एक लाख ग्राम पंचायतों को कवर किया जाना दिखाता है कि सरकार सिर्फ संख्या नहीं, गुणवत्ता पर भी ध्यान दे रही है.
2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से जनधन योजना की घोषणा की थी, तब कई विशेषज्ञों ने इसे ‘अतिशयोक्ति’ कहा था. परंतु एक दशक बाद, यही योजना ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिस बन गई है. यह मोदी सरकार की सामाजिक-आर्थिक नीतियों में एक क्रांतिकारी बदलाव का प्रतीक है—जहाँ कल्याण सिर्फ घोषणा नहीं, निष्पादन में विश्वास करता है. बहरहाल, बैंकिंग विशेषज्ञों के अनुसार इस योजना में अब और सुधारों की जरूरत है. जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में खाताधारकों को डिजिटल लेनदेन, बीमा दावों और बचत निवेश के प्रति जागरूक करने के लिए सामुदायिक स्तर पर वित्तीय शिक्षा शिविर आयोजित किए जाएं.
जिन खातों में नियमित लेनदेन होता है, उन्हें बिना गारंटी के छोटे ऋण देने की सुविधा बढ़ाई जाए ताकि वे स्वयं का व्यवसाय शुरू कर सकें. हर ग्राम पंचायत स्तर पर मिनी एटीएम या बैंकिंग मित्र की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए ताकि दूरदराज़ के क्षेत्रों में भी बैंकिंग सेवाएं सहज रूप से उपलब्ध हों. दरअसल,
प्रधानमंत्री जनधन योजना ने दिखा दिया कि जब नीयत साफ हो और नीति स्पष्ट हो, तो परिवर्तन सिर्फ संभव नहीं, अवश्यंभावी होता है. यह योजना सिर्फ बैंकिंग क्रांति नहीं, गरीबी उन्मूलन और आत्मनिर्भर भारत की नींव है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस दूरदर्शी पहल को आज गौरव और वैश्विक प्रेरणा के रूप में देखा जा रहा है.
