
विदिशा।बुधवार को विदिशा रेलवे स्टेशन पर मानव तस्करी का मामला सामने आया, जिसने न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था को सतर्क कर दिया, बल्कि सामाजिक तंत्र की जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.आरपीएफ और विदिशा की सामाजिक संस्था सोशल वेलफेयर सोसाइटी की सतर्कता और संयुक्त प्रयासों के चलते 20 नाबालिग बच्चों को मानव तस्करी के जाल से बचा लिया गया. ये सभी बच्चे बिहार के कटिहार जिले के निवासी हैं और इन्हें सूरत की साड़ी फैक्ट्रियों में काम कराने के उद्देश्य से मुंबई के रास्ते ले जाया जा रहा था. इस पूरे मामले की शुरूआत सोमवार रात को, जब सोशल वेलफेयर सोसाइटी की संयोजक दीपा शर्मा को एक खुफिया सूचना मिली कि कुछ मानव तस्कर ट्रेन के जरिए बड़ी संख्या में नाबालिग बच्चों को ले जा रहे हैं. तुरंत इस सूचना को गंभीरता से लेते हुए उन्होंने आरपीएफ से संपर्क किया और संयुक्त रूप से एक ऑपरेशन की योजना बनाई गई.दीपा शर्मा ने बताया कि हमें खबर मिली थी कि बच्चों को झांसा देकर ले जाया जा रहा है। देर रात ही हमारी टीम स्टेशन पहुंच गई और पूरी रात प्लेटफॉर्म पर निगरानी की. सुबह करीब 5 बजे जैसे ही ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आई, टीम हरकत में आ गई .चूंकि ट्रेन का स्टॉपेज केवल दो मिनट का था, इसलिए त्वरित निर्णय लेते हुए चेन पुलिंग की गई और ट्रेन को रोका गया. फिर तेजी से कार्रवाई करते हुए 34 लोगों को ट्रेन से उतारा गया, जिनमें से 20 बच्चे नाबालिग पाए गए. ट्रेन में मौजूद कई तस्कर अफरा-तफरी का फायदा उठाकर फरार हो गए, लेकिन 6 आरोपियों को मौके से ही गिरफ्तार कर लिया गया. इन पर बच्चों को जबरन मजदूरी के लिए ले जाने का आरोप है. रेस्क्यू किए गए बच्चों की उम्र 10 से 16 वर्ष के बीच है. सभी बच्चे डरे-सहमे थे, और उनमें से कई तो पूरी रात जागते रहे थे. पूछताछ में पता चला कि उन्हें काम दिलाने के नाम पर बिहार से लाया गया था. किसी को पैसे का लालच देकर, तो किसी को फैक्ट्री में पढ़ाई के साथ काम का सपना दिखाकर इस जाल में फंसाया गया था. बच्चों के पास कोई पहचान पत्र नहीं था. कुछ बच्चों को तो यह भी नहीं मालूम था कि उन्हें किस शहर में ले जाया जा रहा है. इस मामले में अंतरराज्यीय मानव तस्करी गिरोह के सक्रिय होने की आशंका है. आरोपी बिहार, महाराष्ट्र और गुजरात के बीच बच्चों को ट्रांसपोर्ट कर रहे थे. हमने मोबाइल रिकॉर्ड्स, टिकट डिटेल्स और बातचीत के आधार पर जांच शुरू कर दी है.
