महाकौशल में बदलेंगे सियासी समीकरण

महाकौशल की डायरी

अविनाश दीक्षित

सर्वविदित है कि राजनीति में प्रत्येक घटनाक्रम के अलग मायने होते हैं, जिनका मतलब और असर भी जुदा होता है। किसी की नियुक्ति अथवा विदाई को लेकर भी कयासबाजियों का दौर शुरू हो जाता है। मौजूदा सूरते हाल में भगवा दल में नए प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के पार्टी ध्वज संभालते ही महाकौशल में नए समीकरण पर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है ।कुछ दिन पहले तक भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रहे विष्णु दत्त शर्मा की लॉबी का संगठन में बोलबाला रहा किंतु अब नए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नए समर्थक सामने आने लगे हैं। भाजपा में संगठन सर्वोपरि माना जाता है, लिहाजा नेतृत्वकर्ता चेहरा कोई भी रहे, संगठन की आंतरिक गतिविधियों पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता।

मगर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि नेतृत्व में बदलाव के साथ ही सांगठनिक समीकरणों पर सतही प्रभाव पड़ता ही है, जिसका असर जिला स्तर पर भी दिखाई देता है। बात महाकौशल के सबसे बड़े जिले जबलपुर की करें तो यहां हर स्तर पर गुटबाजी चरम पर है। वरिष्ठ नेता भले ही सार्वजनिक मंचों पर इस बात को ना स्वीकारते हों परंतु हकीकत पार्टी कार्यकर्ताओं से बेहतर कोई नहीं जानता। जबलपुर में सांसद आशीष दुबे और लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह के बीच अघोषित तौर पर तलवार खिचीं हुई है, वहीं वीडी शर्मा के खास एक विधायक का गुट अपने अलग अंदाज में राजनीतिक स्टंट बाजी में लगा हुआ है।

ग्रामीण क्षेत्र के एक वरिष्ठ और चर्चित विधायक की सियासत भी अलग तरीके से चल रही है। ऐसे में जबलपुर के भाजपाई गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि नया प्रादेशिक नेतृत्व क्या संस्कारधानी के निरपेक्ष और फिलहाल हॉशिए पर पड़े भाजपाई कार्यकर्ताओं को उनका हक और सम्मान दिला पाएगा…? फिलहाल इस बात को लेकर अटकलों का दौर चल रहा है। भाजपा के ही खांटी कार्यकर्ता यह आशा लगाए बैठे हैं कि प्रादेशिक नेतृत्व परिवर्तन से वर्षों से लूप लाइन में डले तथा संगठन के कार्यों में दक्ष नेताओं को अब संगठन में पद और सम्मान मिलेगा। बहरहाल जो कुछ भी होगा उसका पता भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है, अलबत्ता उसकी एकाध झलक जल्द ही नजर आ सकती है।

अधिकारियों का बदलेगा रवैया

भाजपा के प्रादेशिक नेतृत्व में बदलाव का प्रभाव भले ही प्रत्यक्ष तौर पर प्रशासनिक हल्कों में नजर नहीं आता हो लेकिन यह दस्तूर जग जाहिर है कि सत्तारूढ़ दल के मुखिया का राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों में प्रभाव रहता ही है। इस बात के मद्देनजर अधिकारियों के रवैये में भी परिवर्तन आना भी तय माना जा रहा है। अभी जिनकी आवभगत होती थी, उनसे किनारा कर लिया जाएगा और नए प्रदेश अध्यक्ष के करीबी नेताओं – विधायकों को ज्यादा तवज्जो मिलने लगेगी। संगठन के प्रभावी नाम की सूची प्रशासनिक अधिकारियों के मोबाइल पर बदल जाएगी। भाजपाई सियासत के बदले स्वरूप के चलते पार्टी के वह नेता जो पुलिस के रडार में आने से बचे रहे थे, उनके भी अब कानूनी शिकंजे में कसे जाने के आसार बढ़ गए हैं। फिलहाल बदले माहौल में सियासत किस करवट बैठेगी, इस पर राजनीतिक विश्लेषकों की नजर लगी हुई है।

अफसरों के जाल में उलझीँ मंत्री

मंडला से विधायक और प्रदेश की पीएचई मंत्री संपत्तिया उईके द्वारा 1000 करोड़ कमीशन लेने का मामला इन दिनों खासी सुर्खियां बटोर रहा है। बीते सप्ताह यह विषय कैबिनेट बैठक में भी उठा । चर्चा है कि अधिकारियों को बाहर करने के बाद मुख्यमंत्री ने अन्य मंत्रियों से कहा कि मंत्री की शिकायत का विषय उनके पास आना चाहिए था, फिर सीधे शिकायत नीचे कैसे चली गई..? उन्होंने आश्चर्य पूर्ण भाव से कहा कि ऐसी शिकायतें जिन्हें एंटरटेन ही नहीं किया जाना चाहिए उन शिकायतों पर कागज कैसे चल जाते हैं..? कुछ ऐसे ही सवाल अन्य मंत्रियों ने उठाए और कहा कि मंत्री के अधीनस्थ अधिकारी मंत्री के खिलाफ आई शिकायत की जांच कैसे कर सकता है…?

खबर है की ईएनसी को सिविल सेवा आचरण का उल्लंघन करने पर नोटिस जारी कर दिया गया है। फिलहाल पूर्व विधायक किशोर समरीते द्वारा की गई शिकायत और उस पर चली कागजी कार्रवाई से माहौल गरमाया है। चर्चाएं अनेक तरह की हो रही हैं, कुछ लोग शिकायत को सही नहीं मान रहे हैं, तो कुछ किशोर समरीते की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। जबकि कुछ लोगों का कहना है कि शिकायत का अंजाम कुछ भी हो लेकिन यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि एक मंत्री को उसके अधीनस्थ अधिकारी ही उलझा सकते हैं तो फिर आम जनों के प्रति अफसरों का रवैया कैसा रहता होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

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