नयी दिल्ली 08 जुलाई (वार्ता) उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के संसद में 40 वर्ष से अधिक लंबे और अनुपम कार्यकाल की जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए राज्यसभा सचिवालय उनकी स्मृति में व्याख्यान श्रृंखला और फेलोशिप शुरू करेगा।
श्री धनखड़ ने मंगलवार को यहां पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की समाधि पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने श्री चंद्रशेखर को ‘भारत माता के महानतम सपूतों में से एक’ बताते हुए कहा कि उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए कार्य किया और ‘युवा तुर्क’ के रूप में अंतर दलिय लोकतंत्र सुनिश्चित करने के लिए अपनी अलग पहचान बनायी।
उप राष्ट्रपति ने कहा, “वो निर्भीक राजनेता थे। एक ऐसे राजनेता जो सच्चे मायनों में राजनेता जैसे कार्य करते थे। जब बात भारत की राष्ट्रीयता की आती थी, तो उन्होंने कभी भी अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता या आराम की परवाह नहीं की। उन्होंने हमें हमेशा गर्वित किया। वो भारत की एकता के प्रतीक थे। वो हमेशा विभाजनकारी ताकतों के खिलाफ खड़े रहे। वे हमारे लिए एक मज़बूत स्तंभ थे।”
श्री धनखड़ ने श्री चंद्रशेखर के राजनीतिक जीवन को याद करते हुए कहा कि उनका राजनीतिक जीवन अद्वितीय और अनुपम रहा है। वह 1962 से 1977 तक 15 वर्ष राज्यसभा के सदस्य रहे और इसके बाद 2007 में निधन तक, एक बार को छोड़कर, लगातार लोकसभा के सदस्य रहे। उन्होंने कहा कि भारत की एकता के लिए ‘पदयात्रा’ का समय श्री चंद्रशेखर के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण काल रहा।
उप राष्ट्रपति ने श्री चंद्रशेखर की स्मृति में व्याख्यान श्रृंखला शुरू करने की घोषणा करते हुए कहा,“मुझे लोकसभा में उनके साथ सदस्य रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ऐसे महान भारत पुत्र जो हमारी सभ्यतागत परंपराओं से निकली मूल्यों के प्रतीक थे उनकी स्मृति में व्याख्यान श्रृंखला प्रारंभ करना सबसे उपयुक्त और सार्थक कार्य होगा।”
उन्होंने कहा कि राज्यसभा सचिवालय इस दिशा में कदम उठाएगा। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने श्री चंद्रशेखर के साथ कार्य किया है और उन्हें निकटता से जाना है। ऐसे में उनके नेतृत्व में इस व्याख्यान श्रृंखला के लिए समिति का गठन सबसे उचित होगा। उन्होंने कहा,“ मैंने यह निर्णय बहुत सोच-समझकर लिया है और उन सभी सदस्यों से परामर्श किया है, जो चंद्रशेखर जी को निकट से जानते थे। सभी इस पर सहमत थे। हरिवंश जी इस दिशा में सभी आवश्यक कदम उठाएंगे।”
उप राष्ट्रपति ने कहा,“हरिवंश जी उचित सुझाव देंगे ताकि हम उनकी स्मृति में एक फेलोशिप भी आरंभ करें। यह एकमुश्त फेलोशिप होगी,ताकि उनकी गतिविधियों और कार्यों का संकलन किया जा सके, और उसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जा सके। यह भी उसी समिति द्वारा समन्वित किया जाएगा जो व्याख्यान श्रृंखला का संचालन करेगी।”
लोकसभा में श्री चंद्रशेखर के साथ कार्य करने के अनुभव को साझा करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा, “यह समय है कि हमारे युवा ‘यंग तुर्क’ के बारे में जानें,उस नेता के बारे में जानें जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लड़ने वाले थे। आपातकाल के समय जब वे सत्तारूढ़ दल के वरिष्ठ नेता थे, उन्हें जेल में डाला गया था।”
श्री धनखड़ ने कहा कि श्री चंद्रशेखर ने कभी भी राष्ट्र के लिए कोई समझौता नहीं किया। वह सबसे कठिन समय में प्रधानमंत्री बने। उन्होंने कहा, “ मैं कई अनमोल क्षण साझा करता हूं। मैं बहुत कनिष्ठ था लेकिन मैंने उनकी रीढ़ की मज़बूती को देखा जब उन्हें लगा कि उनके मूल्य समझौते की ओर जा रहे हैं उन्होंने एक पल की भी देरी नहीं की। उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। जो पुस्तक प्रकाशित होगी, उसमें मैं अपने व्यक्तिगत विचार भी साझा करूंगा कि कैसे उन दिनों के प्रभावशाली लोगों ने उन्हें लोकसभा में इस्तीफा देने से रोकने की गंभीर कोशिश की। मैं स्वयं उस दिन लोकसभा में बैठा था जब नेता जी ने सीधे राष्ट्रपति भवन जाकर अपना त्यागपत्र सौंप दिया।”
उप राष्ट्रपति ने कहा कि मौजदा परिस्थितियों में श्री चंद्रशेखर के मूल्य और आदर्शों की देश को सबसे अधिक आवश्यकता है। “ चंद्रशेखर जी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके मूल्यों पर विश्वास रखें, उनके आदर्शों को अपनाएं और लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों में आस्था रखें।”

