जलवायु परिवर्तन पर चर्चा की सार्थकता जरूरतमंद देशों के लिए पर्याप्त धन , प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में है-मोदी

रियो डी जेनेरियो (वार्ता) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जलवायु परिवर्तन के विषम प्रभाव को मान्यता देकर इससे प्रभावित कमजोर के साथ न्याय के समुचित समाधान की व्यवस्था को एक नैतिक कर्तव्य बताते हुए कहा है कि यदि इस काम के लिए जरूरतमंद देशों को उचित प्रौद्योगिकी और समुचित धन सहायता न दी गई तो जलवायु परिवर्तन से निपटाने की बात खोखली चर्चा बनकर रह जाएगी।

श्री मोदी आज यहां पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संधि के सदस्य देशों के सम्मेलन- कॉप 30 और वैश्विक स्वास्थ्य विषय पर ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान आयोजित एक बैठक में भारत का वक्तव्य प्रस्तुत कर रहे थे।

श्री मोदी ने कहा,”भारत के लिए ‘जलवायु न्याय’ कोई विकल्प नहीं, एक नैतिक कर्तव्य है। भारत का मानना है कि ज़रूरतमंद देशों को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और मुनासिब दर पर कर्ज के बिना, जलवायु संबंधी कार्रवाई सिर्फ जलवायु पर चर्चा तक ही सीमित रहेगी।”

उन्होंने जलवायु परिवर्तन से निपटने की महत्वाकांक्षा और उसके लिए वित्त व्यवस्था के बीच अंतर को बांटने की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि इस मामले में विकसित देशों की विशेष और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। हमें उन सभी देशों को साथ लेकर चलना होगा जो विभिन्न तनावों के चलते भोजन, ईंधन , उर्वरक और धन के संकट से जूझ रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भविष्य को लेकर जो आत्मविश्वास विकसित देशों में है वही आत्मबल इन देशों में भी होना चाहिए। किसी भी प्रकार के दोहरे मापदंड के रहते मानवता का सतत और समावेशी विकास संभव नहीं है।

उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन से जलवायु संबंधी की पोषण के संबंध में जारी किया जा रहा व्यवस्था संबंधी घोषणा पत्र एक सराहनीय कदम है। उन्होंने कहा कि भारत इसका समर्थन करता है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि विश्व की सबसे तेज गति से वृद्धि करती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था होते हुए भी भारत जलवायु परिवर्तन पर पेरिस में हुए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में अपने देश संबंधी लक्षणों को समय से पहले पूरा करने वाला पहला देश है। उन्होंने कहा,” हम 2070 तक कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि के स्तर को निवल रूप से शून्य करने के लक्ष्य की ओर भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं।” पिछले दस वर्षों में भारत में सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता में 4000 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने कहा, ” इन प्रयासों से हम एक स्वस्थ -श्यामल भविष्य की मजबूत नींव रख रहे हैं।

उन्होंने कहा कि भारत की जी20 अध्यक्षता के दौरान हमने स्वस्थ विकास और उत्तर दक्षिण के बीच की खाईं को कम करने पर जोर दिया था। इस उद्देश्य से हमने सभी देशों के साथ हरित विकास के प्रस्ताव पर सहमति बनाई थी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि काप-30 का आयोजन इस वर्ष ब्राज़ील में हो रहा है। ऐसे में ब्रिक्स सम्मेलन में पर्यावरण पर चर्चा प्रासंगिक भी है और समयानुकूल भी।

भारत के लिए उन्होंने कहा कि भारत जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध उपाय और पर्यावरण सुरक्षा हमेशा से उच्च प्राथमिकता के विषय रहे हैं। हमारे लिए जलवायु परिवर्तन केवल ऊर्जा का विषय नहीं है। ये जीवन और प्रकृति के बीच संतुलन का विषय है।

पृथ्वी का स्वास्थ्य और मनुष्य का स्वास्थ्य एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। कोविड महामारी ने हमें सिखाया है कि वायरस वीसा लेकर नहीं आते और समाधान भी पासपोर्ट देखकर नहीं चुने जाते।! साझा चुनौतियों का हल सिर्फ साझे प्रयासों से ही संभव है।

उन्होंने कहा कि भारत ने “एक ही धरती एक ही स्वास्थ्य” के मूलमंत्र से सभी देशों के साथ सहयोग बढ़ाया है। आज भारत में विश्व की सबसे बड़ी बीमा योजना, “आयुष्मान भारत” 50 करोड़ों से भी ज्यादा लोगों के लिए वरदान बनी है। आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्धा जैसे परंपरागत औषधियों का पारिस्थितिकी तंत्र खड़ा किया गया है। डिजिटल हेल्थ के माध्यम से हम देश के हर कोने में ज्यादा से ज्यादा लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचा रहे हैं। इन सभी क्षेत्रों में भारत का सफल अनुभव साझा करने में हमें खुशी होगी।

श्री मोदी ने कहा कि मुझे खुशी है कि ब्रिक्स में भी स्वास्थ्य सहयोग बढ़ाने पर विशेष बल दिया गया है। 2022 में लॉन्च किया गया ब्रिक्स वैक्सीन अनुसंधान एवं विकास केंद्र इस दिशा में एक मजबूत पहल है। उन्होंने कहा कि आज जारी किया जा रहा “सामाजिक रूप से बीमारियों के निर्मूलन के लिए भागीदारी पर वृक्ष नेताओं का वक्तव्य ”, हमारे सहयोग को मजबूत करने के लिए नई प्रेरणा देगा।

श्री मोदी ने कहा ,” अगले वर्ष भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता में हम सभी विषयों पर करीबी सहयोग जारी रखेंगे। भारत की अध्यक्षता में हम ब्रिक्स को नए रूप में परिभाषित करने पर काम करेंगे और वृक्ष स्वस्थ विकास का पर्याय बनेगा।”

 

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