
रीवा/चाकघाट, 7 जुलई, बरसात प्रारम्भ होते ही खेतों में बैलों के गले की घंटियों की जगह अब टैक्टरों की भड़भड़ाहट सुनाई देने लगी है. मेहनतकश बैलों के लिए अब न खेत में जगह रह गई और न ही किसान के घर में. बैलों के झुण्ड समय और इंसान की बेरूखी के कारण सडक़ों पर भूखे प्यासे विचरण के लिए विवश हो गए हैं. सडक़ पर आए दिन वाहन दुर्घटना से मवेशी मर रहे हैं. मवेशी की सींग पर चमकते स्टीकर की योजना भी इस अंचल में अब तक नही पहुँची है.
इस घरती पर गौवंश जो कभी खुशहाली और समृद्धि के प्रतीक माने जाते थे, अब वही पशुधन अवारा मवेशी के नाम पर समस्या बनते जा रहे हैं. उनके लिए न गाँवों में जगह बची है और न ही शहर में. पशु चूंकि पशु ही होते है. बेजुबान होने के कारण उन्हें जगह जगह लाठी डन्डे और प्रताडऩा ही मिलती है. यदि पशु बोलना जानते तो वे भी गौमाता के नाम पर राजनीति करने वालों से यही प्रश्न पूछते कि आदि काल से पशुओं के नाम पर गौचर/चारागाह एवं खरकौनी के लिए छोड़ी गई भूमि कहाँ गई ? पशुधन को पानी पीने के लिए गाँव-गाँव में खुदे भारी भरकम क्षेत्रफल वाले तालाब कहाँ गए? चारागाह और खरकौनी की हजारों एकड़ भूमि हड़पने वालों पर क्या कभी कार्यवाही होगी. गुम हो रहे तालाबों को क्या कभी फिर से खोजा जाएगा? या आवारा पशुओं के नाम पर उन्हें कत्लखाने की ओर ही भेजा जाएगा?
