सुप्रीम कोर्ट एकल माताओं के बच्चों के ओबीसी प्रमाणपत्र विवाद पर करेगा विचार

नयी दिल्ली, 23 जून (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि एकल माताओं के बच्चों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) प्रमाणपत्र जारी करने के लिए संबंधित नियमों में संशोधन करने का निर्देश देने की मांग वाली रिट याचिका पर विचार करेगी।

न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की अंशकालीन कार्य दिवस पीठ ने इस मामले में विस्तृत सुनवाई की जरुरत बताते हुए कहा कि इस मामले में 22 जुलाई को विचार किया जाएगा।

पीठ ने कहा, “मौजूदा रिट याचिका एकल माताओं के बच्चों को ओबीसी प्रमाणपत्र जारी करने के बारे में एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाती है, जिसमें मां ओबीसी से संबंधित है।”

शीर्ष अदालत में केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने कहा कि उन्होंने याचिका पर अपना जवाबी हलफनामा दायर किया है।

शीर्ष अदालत ने 31 जनवरी को दिल्ली की एक महिला द्वारा दायर याचिका पर केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया और उनसे जवाब मांगा।

पीठ ने आज इसे एक महत्वपूर्ण मुद्दा बताते हुए कहा, “इस पर सुनवाई होनी चाहिए।”

पीठ ने शीर्ष न्यायालय के 2012 के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें ऐसे व्यक्ति की स्थिति से जुड़े सवाल पर विचार किया गया था, जिसके माता-पिता में से एक अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है और दूसरा किसी भी श्रेणी से संबंधित नहीं है।

केंद्र के वकील ने कहा कि इस मुद्दे पर विचार-विमर्श की आवश्यकता है और सभी राज्यों को इस मामले में पक्षकार बनाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय से दिशा-निर्देशों की आवश्यकता होगी। वकील ने कहा कि विभिन्न कारकों पर विचार किया जाना चाहिए, जिसके बाद दिशा-निर्देश तैयार किए जाएंगे।

याचिकाकर्ता ने कहा कि ओबीसी प्रमाण पत्र एकल मां के पास मौजूद प्रमाण पत्र के आधार पर जारी किया जाना चाहिए।

इस पर पीठ ने कहा, “मामले के महत्व को देखते हुए (मुख्य न्यायाधीश के आदेश के अधीन) मामले को 22 जुलाई को अंतिम सुनवाई के लिए रखा जाना चाहिए।”

पीठ ने पक्षकारों को अपने लिखित प्रस्तुतियाँ दाखिल करने का निर्देश दिया। पीठ ने उन्हें यह भी कहा कि वे उस परिदृश्य की जाँच करें जहाँ एकल माँ ने अंतरजातीय विवाह किया हो।

याचिका में कहा गया है कि प्रतिवादी अधिकारियों द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, एकल माता के ओबीसी प्रमाण-पत्र के आधार पर ओबीसी प्रमाण-पत्र नहीं दिया जा सकता और आवेदक को केवल पैतृक पक्ष से ही ऐसा प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना होगा।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि प्रतिवादियों द्वारा की गई ऐसी कार्रवाई स्पष्ट रूप से संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध है।

याचिका में कहा गया है, “प्रतिवादियों द्वारा एकल माता के बच्चों को उनकी (एकल माता के) अन्य पिछड़ा वर्ग प्रमाण-पत्र के आधार पर ओबीसी प्रमाण-पत्र जारी करने में की गई निष्क्रियता भी अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन है।”

याचिका में इसे संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन भी कहा गया है, क्योंकि अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति श्रेणी से संबंधित एकल माता के बच्चों को उनके प्रमाण-पत्र के आधार पर जाति प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए।

याचिका में कहा गया है कि एकल माता के बच्चों को ओबीसी प्रमाण-पत्र जारी करने के लिए अधिकारियों द्वारा पिता के ओबीसी प्रमाण-पत्र या पैतृक पक्ष पर जोर देना पूरी तरह से उनके द्वारा पाले गए बच्चों के अधिकारों के विरुद्ध है। इसमें ओबीसी प्रमाण-पत्र जारी करने के लिए दिल्ली सरकार के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया गया है।

दिशा-निर्देशों के अनुसार, दिल्ली में रहने वाले और ओबीसी प्रमाण-पत्र के लिए आवेदन करने के इच्छुक किसी भी व्यक्ति को अपने किसी भी रक्त संबंधी का ओबीसी प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना होगा, जिसमें पिता, दादा या चाचा शामिल हैं।

याचिका में यह भी कहा गया है कि ओबीसी श्रेणी से संबंधित एकल मां जो अपने स्वयं के प्रमाण-पत्र के आधार पर अपने दत्तक बच्चे के लिए इस तरह के प्रमाण-पत्र के लिए आवेदन करना चाहती है, उसे पति के ओबीसी प्रमाण-पत्र नहीं होने के कारण आवेदन करने की अनुमति नहीं दी गई।

 

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