तेजस्वी यादव ने ‘जमाई आयोग’ के गठन की उठाई मांग, बिहार में सरकारी नियुक्तियों में पारदर्शिता पर उठाए सवाल; क्या विपक्ष के पास है नया मुद्दा?
पटना, 16 जून (वार्ता): बिहार की राजनीति में एक नया मुद्दा गरमा गया है, और इसकी वजह है राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव द्वारा की गई ‘जमाई आयोग’ के गठन की मांग। इस मांग ने बिहार के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है कि आखिर इसका मकसद क्या है और यह क्यों इतनी सुर्खियां बटोर रही है। तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया है कि बिहार में सरकारी नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर धांधली हो रही है, और इन नियुक्तियों में ‘कुछ खास’ लोगों को तरजीह दी जा रही है।
तेजस्वी यादव का दावा है कि ‘जमाई आयोग’ से उनका तात्पर्य उन नियुक्तियों की जांच से है, जो कथित तौर पर सत्ता में बैठे लोगों के ‘जमाइयों’ या रिश्तेदारों को मिल रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार में कई सरकारी विभागों में हालिया नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार हावी रहा है, जिससे योग्य उम्मीदवारों को मौका नहीं मिल पा रहा है। तेजस्वी की इस मांग को विपक्ष द्वारा सरकार पर हमला बोलने के एक नए तरीके के रूप में देखा जा रहा है, खासकर तब जब बेरोजगारी और भ्रष्टाचार बिहार में एक बड़ा चुनावी मुद्दा है। हालांकि, सत्तारूढ़ दल ने इन आरोपों को निराधार बताया है और इसे तेजस्वी यादव की राजनीतिक स्टंट करार दिया है। सत्तारूढ़ नेताओं का कहना है कि सरकार पूरी पारदर्शिता के साथ नियुक्तियां कर रही है और किसी भी तरह की धांधली का कोई सवाल ही नहीं उठता। उनका मानना है कि तेजस्वी यादव केवल राजनीतिक लाभ लेने के लिए ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं।
तेजस्वी यादव की ‘जमाई आयोग’ की मांग ने युवाओं और छात्रों के बीच भी बहस छेड़ दी है, जो सरकारी नौकरियों के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा गर्माया हुआ है, जहां लोग अपने-अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार सरकार इस मांग पर क्या प्रतिक्रिया देती है और क्या यह मुद्दा आगामी चुनावों में एक महत्वपूर्ण फैक्टर बन पाता है। फिलहाल, तेजस्वी यादव ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है और वह इसे भुनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं ताकि सरकार को घेरा जा सके और युवाओं के बीच अपनी पैठ मजबूत की जा सके।

