नयी दिल्ली, 05 जून (वार्ता) कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदम्बरम ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार जनगणना के बाद परिसीमन को ध्यान में रखते हुए सोची-समझी रणनीति के तहत काम कर रही है और ऐसा कर उसका मकसद दक्षिणी राज्यों की सीटें घटाकर उत्तर भारत की संसदीय सीटें बढ़ाना है।
श्री चिदम्बरम ने कहा कि राष्ट्रव्यापी जनगणना 2021 में होनी चाहिए थी, लेकिन कोविड-19 के कारण जनगणना स्थगित कर दी गई और इसका कारण समझ में आता है। इसके बाद 2022 या 2023 में जनगणना न करने का कोई कारण नहीं था। लोकसभा चुनाव मई-जून 2024 में हुए थे और उसके तुरंत बाद जनगणना 2024 कराई जा सकती थी।
उन्होंने कहा कि भारत की जनगणना संगठन का 2024-25 में बजट आवंटन 1000 करोड़ रुपये था, लेकिन 2025-26 में इसे घटाकर 500 करोड़ रुपये कर दिया गया, यह सब जानते हुए भी कि 500 या 1000 करोड़ रुपये के बजट में राष्ट्रव्यापी जनगणना नहीं कराई जा सकती है। अब 2024-25 बीत चुका है और 2025-26 चल रहा है। संविधान के अनुच्छेद 82 को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने 2021 के बाद जनगणना कराने की बाध्यता टाल दी है।
कांग्रेस नेता ने कहा कि 2026 के बाद देर से कराई गई जनगणना से यह बाध्यता सामने आएगी कि जनगणना के तुरंत बाद परिसीमन करवाना है इसीलिए 2027 में जनगणना कराने की घोषणा कर दी गई है और फिर परिसीमन भी होगा। यदि परिसीमन होता है तो तमिलनाडु और कई राज्यों की कई लोकसभा में सीटें कम होंगी।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार दक्षिणी राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व कम करने और उत्तरी राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी (आरएसएस-भाजपा) के सोचे समझे लक्ष्य को हासिल करने के लिए कदम-दर-कदम आगे बढ़ रहे हैं। जब परिसीमन का विषय पहली बार उठाया गया था, तब उन्होंने भी मोदी सरकार की इस रणनीति की ओर इशारा किया था। प्रभावित होने वाले राज्यों के सभी राजनीतिक दल आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर परिसीमन के खतरों से अवगत नहीं हैं, लेकिन अच्छी बात यह है कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने 2027 में जनगणना और उसके तुरंत बाद परिसीमन के खतरों से सबको अवगत करा दिया है।

