वीरेंद्र वर्मा
इंदौर: शहर में पिछले 27 सालों से नाले को वापस नदी में तब्दिल करने की कवायद चल रही है। पर्यावरण सुधार के लिए नदी प्रमुख स्रोत है। नदी यानि पानी , पानी हो तो पौधरोपण और हरियाली विकसित होगी और पर्यावरण संरक्षण हो सकेगा।एक सर्वे के अनुसार इंदौर की पर्यावरण के लेकर स्थिति बहुत गंभीर है। हालत तह है कि आज शहर का तापमान 42 से 45 डिग्री को छू रहा है। करीब 5 – 6 साल पहले इंदौर का एक दिन का तापमान 46 डिग्री दर्ज किया गया था। यह स्थिति निर्मित होने के लिए विकास के नाम कांटे गए असंख्य पेड़ है।
शहर में बह रहे नाले को उनके मूल स्वरूप कान्ह और सरस्वती नदी में तब्दील करने के लिए नगर निगम द्वारा अभी तक करीब 3000 करोड़ रूपए खर्च किए जा चुके है। नहर भंडारा से लेकर शहर में नवलखा, छावनी, जूनी इंदौर, चंद्र भागा, छत्री बाग सहित कई स्थानों पर नाला टेपिंग की गई है , मगर गंदा पानी ही बह रहा है। स्थिति यह है कि आधा इंच बारिश में शहर की सड़कें तालाब बन जाती है। नाले में मिलने वाले आउटलेट निगम ने बंद कर दिए है। जब शहर में पानी भरता है, तो उन्हीं आउटलेट को खोलना पड़ता है।मतलब यह है कि पर्यावरण सुधार के नाम पर पूर्व और वर्तमान नगर सरकार ने करोड़ों खर्च कर दिए लेकिन नाला जस का तस है।
इंदौर का जमीनी जल स्तर खतरे की स्थिति में
कभी इंदौर और मालवा के लिए कहावत कहीं जाती थी कि “पग पग रोटी और डग डग नीर”। अब उसी शहर का जमीनी जल स्तर खतरे के निशान यानि 1000 फीट नीचे चला गया है। इसका कारण पानी का दोहन जरूरत से ज्यादा बढ़ना, बोरिंग मशीनों से जमीन को छलनी करना और विकास के नाम पर अंधाधुंध पेड़ों की कटाई करना है।
एक समय शहर में इतने कुएं बावड़ी हुआ करते थे और सब मीठे पानी के स्त्रोत माने जाते और उनका पानी बकायदा क्षेत्र के रहवासी करते थे। पानी पीने में उपयोग लिया जाता था। आज हालत बिगड़ चुके है और हर 10 फीट से लेकर 50 फीट की दूरी पर बोरिंग हो रहे है।
राष्ट्रीय भू जल सर्वेक्षण के रिपोर्ट में इंदौर देश के 10 शहरों में
केंद्रीय भू जल सर्वेक्षण की टीम ने इंदौर की स्थिति खतरे के निशान पर बताई है। सर्वे में पाया गया है कि इंदौर का जमीनी जल स्तर बहुत नीचे खतरे के निशान 1000 फीट को पार कर सकता है। जमीनी जल का उपयोग जिस तरह से हो रहा है, उससे केंद्रीय भू जल सर्वेक्षण का आंकलन सही है। सर्वे में देश के टॉप 10 शहरों में इंदौर भी शामिल है, जहां जल स्तर बहुत नीचे चला गया है।
9 प्रतिशत हरियाली बची
कभी इंदौर का तापमान गर्मियों में 1985 से 1990 तक 35 से 38 डिग्री से ज्यादा नही होता था। इसका कारण यह था कि शहर में हर तरफ डामर की सड़क और असंख्य पेड़ थे। अब विकास के नाम पर शहर में डामर रोड की जगह सीमेंटीकरण के साथ 1 लाख से ज्यादा पेड़ काट कर पर्यावरण खराब कर दिया। आज शहर में 20 प्रतिशत हरियाली होना चाहिए, लेकिन 9 प्रतिशत हरियाली रह गई है। इस तरह हो रहा है पर्यावरण संरक्षण पर काम ।
करीब 1980 तक नदी अस्तित्व में थी
इंदौर में कान्ह और सरस्वती नदी हुआ करती थी। उक्त नदियों का पानी शिप्रा में जाकर मिलता था। शिप्रा नदी उक्त दोनों नदियों के जल से जीवनदायनी कहलाती थी। इंदौर में बारह मत्था बगीची और नहर भंडारा के साथ नवलखा पर लोग नहाते थे। शहर की आबादी बढ़ी और नदी में पानी आने के स्त्रोत पर अतिक्रमण और कब्जे होते गए। स्थिति यह हो गई कि देखते देखते नाले बन गए और सारा ड्रेनेज का पानी और आउटलेट नदियों में छोड़ दिया। शहर के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाला पानी गंदे नालों में बदलकर बदबूदार हो गया।
नाले को नदी में बदलने की शुरुआत
इंदौर में नाले को नदी बनाने की शुरुआत मधुकर वर्मा के कार्यकाल में हुई थी। तीन करोड़ के लागत से किशन पूरा पर बारिश का पानी रोक कर फव्वारे और झील निर्मित की गई, लेकिन बदबूदार पानी के कारण बंद करना पड़ा। फिर विजयवर्गीय, उमाशशि शर्मा, कृष्णमुरारी मोघे, मालिनी गौड़ और पुष्यमित्र भार्गव के कार्यकाल में नदी बनाने के लिए हर साल 500 सौ करोड़ के लगभग खर्च हो रहे है।इसके तहत कान्ह और सरस्वती के उदगम स्थल से नाला टेपिंग और सिवरेज ( ड्रेनेज) का गंदा पानी रोकने के लिए लाइन डालने से लेकर नदी में मिल रहे आउटलेट को बंद करने का कार्य पिछले 27 सालों से निरंतर जारी है। नतीजा यह है कि आज भी नाला और बदबूदार पानी ही बह रहा है, थोड़ी बदबू जरूर कम हुई है, बस।
