भूपेन्द्र भूतड़ा
उज्जैन : 2028 में सिहस्थ का बड़े पैमाने पर आयोजन होने जा रहा है जिसमें करोड़ों श्रद्धालुओं की आने की संभावना है । पुराणों में महाकाल , महाकाल वन के साथ-साथ शिप्रा का भी महत्व दर्शाया गया है । इसलिए शिप्रा में स्नान करना भी सिंहस्थ के समय और आम दिनों में भी पौराणिक महत्व लिए हुए रहता है । शिप्रा शुद्धिकरण के प्रयास किया जा रहे हैं और अपेक्षा है कि सिंहस्थ के पूर्व शिप्रा शुद्धिकरण का कार्य पूरा हो जाए ।
क्षिप्रा नदी उज्जयिनी के निकट बहने वाली नदी है । क्षिप्रा चम्बल नदी की सहायक नदी है । दक्षिण-पूर्वी छोर से क्षिप्रा उज्जैन नगर में प्रवेश करती है। फिर वह हर मोड़ पर सुंदर-मनोहर दृश्य बनाती चलती है। त्रिवेणी का तट, रामघाट, नृसिंह घाट, गऊ घाट या दत्त का अखाड़ा या चिंतामन गणेश, कहीं से भी देख लीजिए कलकल-छलछल करती क्षिप्रा के चमचमाते जल के दर्शन नयानाभिराम होते हैं । वह भर्तृहरि गुफा के समक्ष मुस्कुराती है और सिद्धवट पर पिंड दान कर्म करते हुए उदास लगने लगती है।
पीर मछंदर,गढ़कालिका और कालभैरव क्षेत्र को पार कर सांदीपनि आश्रम और राम जनार्दन मंदिर को स्पर्श करती हुई मंगलनाथ में उफान पर लगती है। कालियादेह महल में अपने घुमाव को वह सहजता से लेती है और तब भी खिली-खिली, खिलखिलाती हुई ही लगती है।इसी क्षिप्रा के तट पर तपस्वियों ने सिद्धियां प्राप्त की है और इसी क्षिप्रा के घाट पर श्रावण मास में जब महाकाल महाराज अपने लाव-लश्कर के साथ पहुंचते हैं तो क्षिप्रा प्रसन्न हो कर उनके पांव पखारती है।
सिंहस्थ सिर पर है, क्या यही है हमारे इंतजाम?
नदी के घाट पर कुछ जगह-जगह खुदे गढ्ढे, उफनते नाले, प्लास्टिक कचरों का जमावड़ा, फूल-पत्ते मालाएं, नदी में विसर्जित की गई पूजन सामग्री, गंदे कपड़े और ना जाने क्या-क्या आमजन को समझना होगा और संभलना भी होगा।क्षिप्रा नदी, की दुर्दशा एक गंभीर मुद्दा है। इस नदी में गंदा पानी, औद्योगिक अपशिष्ट और नालों का पानी मिलने के कारण नदी का पानी दूषित हो रहा है। जानकारी के अनुसार, शिप्रा नदी में रोजाना 1036 एमएलडी गंदा पानी कान्ह नदी के माध्यम से आ रहा है, जो इसे नहाने लायक भी नहीं बनाता।
सिंहस्थ के पहले उज्जैन में क्षिप्रा नदी निर्मल हो जाएगी। साथ ही हमेशा यह कलकल बहती रहेगी। इसके लिए 614 करोड़ से ज्यादा लागत की सेवरखेड़ी-सिलारखेड़ी परियोजना का काम चल रहा है । इस परियोजना से करीब 65 गांवों के 18 हजार 800 हेक्टेयर क्षेत्र में पेयजल और सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो सकेगी।इस परियोजना के अंतर्गत सेवरखेड़ी में 1.45 घनमीटर जल क्षमता का बैराज बनाया जाएगा। इसके बाद वर्षाकाल के जल को यहां से करीब साढ़े छह किलोमीटर दूर पाइप के जरिए लिफ्ट करके उज्जैन के ही ग्राम सिलारखेड़ी में निर्मित तालाब में एकत्रित किया जाएगा। इसके लिए तालाब की उंचाई बढ़ाकर उसके जलभराव की क्षमता में भी वृद्धि की जाएगी। जिससे तालाब में कुल 51 घनमीटर जल जमा हो सकेगा । इसके बाद जब क्षिप्रा नदी में पानी कम होगा, तब इसी तालाब से क्षिप्रा में जलापूर्ति की जाएगी।
सिंहस्थ में क्षिप्रा जल से ही स्नान
2016 में नर्मदा क्षिप्रा के जल से सिंहस्थ में श्रद्धालुओं को स्नान कराना पड़ा था लेकिन अब 2028 में क्षिप्रा के जल में ही साधू-संत और श्रद्धालु स्नान करेंगे। इस परियोजना की रुपरेखा मध्यप्रदेश शासन ने तैयार की है, जिसे अब धरातल पर उतारा जा रहा है वही वर्ष 2028 तक क्षिप्रा नदी को प्रदूषणमुक्त बनाने की तैयारी की जा रही है ।
