खोखली हो गई कमानिया की घड़ी

जबलपुर: संस्कारधानी के ह्रदयस्थल कहे जाने वाले कमानिया गेट में लगी घड़ी समय के साथ अब खोखली हो चुकी है। जिसके बीच में से दूसरी तरफ देखा जा सकता है, लेकिन अब समय नहीं देख सकते हैं। कई सालों से यह घड़ी ऐसे ही बंद पड़ी थी, जो कि अब पूरी तरह से टूट चुकी है। जिस पर अब न कोई जनप्रतिनिधि और न ही निगम प्रशासन का ध्यान है। शहर के मुख्य बाज़ार में स्तिथ ऐतिहासिक स्मारक का उपयोग अब नेताओं और जनप्रतिनिधियों के बैनर और पोस्टर लगने में होता है। वही नेताओं की नजर कभी इसकी बंद पड़ी घड़ी पर नहीं जाती है। जिसके चलते यह धरोहर भी अनदेखी की शिकार हो गई है।
कांग्रेस का रहा है गहरा नाता
स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के दौरान जबलपुर शहर ने एक प्रमुख भूमिका निभाई थी। एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना 1939 में त्रिपुरी कांग्रेस के आयोजन में हुई थी। नेताजी सुभाष चंद्रबोस ने 1939 में त्रिपुरी कांग्रेस के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के लिए चुनाव जीता था। जबलपुर में उसकी याद में कमानिया गेट बनाया गया था। जिसके चलते इसका नाम भी त्रिपुरी कांग्रेस स्मारक रखा गया है और कांग्रेस का इससे नाता भी रहा है।
नींव में तमाम बातें जड़ी और जुड़ी
कमानिया गेट बाजार उस समय शहर की जीवन रेखा थी। आज एक विशाल आभूषण बाजार भी कमानिया गेट के पास बना हुआ है। कमानिया गेट सिर्फ एक गेट नहीं है, यह जबलपुर शहर की ऐतिहासिक धरोहर भी है। इसकी नींव में तमाम बातें जड़ी और जुड़ी हैं। इसकी भव्य बनावट गर्व का अहसास कराती है। इसके बाद भी इसकी हालत इस कदर बदहाल हो गई है।
इनका कहना है
बचपन से कमानिया गेट देखते आ रहे हैं, सालों पहले इसकी मरम्मत हुई थी और घड़ी भी चालू थी लेकिन अब यह बंद पड़ी हुई है।
मुकेश चौरसिया

कोई जमाना था जब दुकान से ही नजर मारकर कमानिया की घड़ी में समय देख लिया करते थे, लेकिन अब घड़ी ही नहीं बची है।
ज्ञानचंद ताम्रकार

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