
जबलपुर। मासूम बेटे, पत्नी तथा मॉ-बाप की हत्या के आरोप में फांसी की सजा से दंडित व्यक्ति को हाईकोर्ट से राहत मिली है। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस देव नारायण मिश्रा की युगल पीठ ने अपने आदेश में कहा है कि घटना के समय अपीलकर्ता किस हालत में था। उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और उसका एक नाबालिक बेटा जीवित है। अपीलकर्ता में सुधार और पुनर्वास की संभावना को देखते हुए मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास की सजा में परिवर्तित किया जाता है।
रायसेन जिले की बरेली कोर्ट ने सितंबर जितेन्द्र पुरविया को सात वर्षीय बेटे सिद्धांत, पत्नी सुनीता, पिता जालिम सिंह तथा मॉ शारदा की हत्या के आरोप में अलग-अलग फांसी की सजा से दंडित किया था। अभियोजन के अनुसार आरोपी ने 16 मई 2019 की रात को फायर आर्म्स तथा कुल्हाडी से घटना को अंजाम दिया था। न्यायालय ने फांसी की सजा की पुष्टि के लिए प्रकरण को हाईकोर्ट भेजा था। इसके अलावा सजा के खिलाफ भी हाईकोर्ट में अपील दायर की गयी थी।
सुनवाई के दौरान तर्क दिया गया कि अभियुक्त घटना दिनांक को खेत से घर पहुँचा तो पत्नी को आपत्तिजनक स्थिति में देखा। जिसके बाद आवेश में आकर उसने घटना को अंजाम दिया। युगलपीठ ने पाया कि प्रकरण में ऐसे कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा पत्नी की मेडिकल रिपोर्ट में भी ऐसा कुछ नहीं पाया गया है।
हमारा मानना है कि अपीलकर्ता का एक नाबालिग पुत्र घटना के समय अपने मामा के घर गया था और वह जीवित है। इसके अलावा घटना के समय अपीलकर्ता नशीले पदार्थों के प्रभाव में था, जो यह प्रदर्शित करता है कि अपराध के समय अपीलकर्ता की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। जेल रिकॉर्ड के अनुसार अपीलकर्ता का आचरण अच्छा है और सुधार और पुनर्वास की संभावना है। अपराध मुख्य रूप से अपराधी की मनोविकृति या मानसिक कमी का परिणाम था। अपीलकर्ता का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। प्रकरण में मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलने के लिए पर्याप्त परिस्थितियां उपलब्ध है। युगलपीठ ने अपीलकर्ता की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए चारों मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील करने के आदेश जारी किये है।
