सीआईसी का आदेश बेईमान और अयोग्य व्यक्तियों को बचाने का प्रयास

 

हाईकोर्ट ने लगाई 25 हजार की कॉस्ट

 

जबलपुर। सूचना के अधिकार एक्ट की गलत व्याख्या करते हुए केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा जानकारी देने से इंकार किये जाने को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि सीआईसी का आदेश से प्रतीत होता है कि बेईमान और अयोग्य व्यक्तियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।

भोपाल स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट में सहायक प्रोफेसर के पद पर पदस्थ जयश्री दुबे की तरफ से उक्त याचिका हाईकोर्ट में दायर की गयी थी। याचिका में कहा गया था कि वर्ष 2000 में भारतीय वन प्रबंधन संस्थान द्वारा एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पद पर चयनित व्यक्तियों को नियुक्ति प्रदान की गयी थी। अधिकारियों द्वारा स्वीकार किया गया है कि एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर डॉ. प्रतीक माहेश्वरी की नियुक्ति अवैध थी, क्योंकि उनके पास आवश्यक योग्यता नहीं थी। नियुक्यिों की जांच के लिए दो आंतरिक कमेटी गठित की गयी थी। जिसके बाद डॉ प्रतीक सहित अन्य चयनित व्यक्तियों को कार्यमुक्त कर दिया गया था।

याचिका में कहा गया था कि डॉ प्रतीक सहित अन्य व्यक्तियों द्वारा चयन प्रक्रिया में प्रस्तुत दस्तावेज तथा जांच के लिए गठित आतंरिक रिपोर्ट प्राप्त करने के लिए उन्होने सूचना के अधिकार के तहत आवेदन दिया था। आईआईएफएफ के प्रथम अपीलेट अधिकारी तथा केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी के द्वारा खारिज कर दिया था। जिसके कारण सीआईसी के समक्ष अपील दायर की गयी थी। सीआईसी ने भी आरटीआई एक्ट की धारा धारा 8(1)(एच) तथा 11 में दिये गये प्रावधानों का हवाला देते हुए बिना सहमति तीसरे पक्ष से संबंधित जानकारी देने से इंकार कर दिया।

एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि धारा 8(1)(एच) के प्रावधानों के तहत सूचना जांच की प्रक्रिया, अपराधियों की गिरफ्तारी या अभियोजन में बाधा उत्पन्न करने वाली जानकारी प्रदान नहीं की जाती है। यह प्रावधान मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों पर लागू नहीं होते हैं। धारा 8(1)(जे) के तहत ऐसी व्यक्तिगत सूचना प्रदान नहीं कर सकते है, जिसका किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से कोई संबंध नहीं है।

इसी प्रकार एक्ट की धारा 11 के तहत जिस सूचना को तीसरे पक्ष द्वारा गोपनीय माना जाता है, उसके संबंध में नोटिस जारी किया जाना आवश्यक है। धारा 11 की उप-धारा (1) के प्रावधान के तहत कानून द्वारा संरक्षित व्यापार और वाणिज्यिक गुप्त मामले को छोड़कर, सार्वजनिक हित में मांगी गयी जानकारी प्रदान की जा सकती है। मुख्य सूचना आयुक्त विनोद कुमार तिवारी द्वारा एक्ट के प्रावधानों का गलत उल्लेख किया गया है। एकलपीठ ने याचिकाकर्ता को पंद्रह दिनों में निशुल्क जानकारी प्रदान करने के निर्देश दिये है। इसके अलावा याचिकाकर्ता को मुकदमा लागत रूप में 25 हजार रुपये प्रदान किये जाने के आदेश जारी किये है। याचिकाकर्ता को उक्त राशि आईआईएफएफ के प्रथम अपीलेट अधिकारी तथा केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी के द्वारा प्रदान की जायेगी। याचिकाकर्ता ने अपना पक्ष स्वयं रखा।

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