क्या बेबस पुलिस दिखा पायेगी ताकत या फिर ठंडे बस्ते में जायेंगे हाई-प्रोफाइल केस

इंदौर: शहर में कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. हाईकोर्ट चौराहे पर वकीलों ने खुलेआम पुलिस को चुनौती दी. अधिकारियों से बदसलूकी की, वर्दी फाड़ दी और पुलिस बेबस नजर आई. दूसरी ओर, हाई-प्रोफाइल मामलों में पुलिस की चुप्पी उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रही है.शनिवार को हाईकोर्ट चौराहे पर अपनी पिटाई के बाद गुस्साए वकीलों ने दो घंटे तक यातायात बाधित किया. वाहन चालकों को बंधक बनाया और पुलिस अधिकारियों से बदसलूकी की. थाना प्रभारी को दौड़ाया, एसीपी और टीआई की वर्दी पर हाथ डाला, लेकिन पुलिस मूकदर्शक बनी रही. हालांकि देर रात पुलिस ने 200 अज्ञात वकीलों पर मामला दर्ज कर लिया, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ये वकील सच में अज्ञात रहेंगे या फिर पुलिस उनकी पहचान कर उन्हें गिरफ्तार करेगी?
पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी नदारद, बल का भी इस्तेमाल नहीं
इस पूरी घटना के दौरान टीआई और एसीपी खुद को बचाने के लिए इधर-उधर भागते नजर आए, लेकिन जोन डीसीपी मौके पर नहीं पहुंचे. कंट्रोल रूम महज 200 मीटर की दूरी पर था, लेकिन वहां से कोई बल नहीं भेजा गया. न ही पुलिस ने चक्काजाम खुलवाने के लिए आंसू गैस या अन्य साधनों का इस्तेमाल किया.
हाई-प्रोफाइल मामलों में पुलिस की चुप्पी
अभी हाल ही में कई हाई-प्रोफाइल मामलों जैसे बाणगंगा थाने का मामला. बाणगंगा पुलिस ने अपनी वाहवाही लूटने के लिए असली आरोपियों पर फर्जी पट्टा चढ़ा कर उनका जुलूस निकाल दिया था, जिससे पुलिस खुद ही सवालों के घेरे में आ गई. उस मामले में भी जांच रिपोर्ट नहीं आई. बीजेपी नेता प्रताप करोसिया के रिश्तेदार पर कार्रवाई में ढिलाई के मामले में भी कमजोर धाराएं लगाईं .कोर्ट में पुलिस ने आपत्ति तक नहीं ली और एक दिन में जमानत मिल गई. आरोपी ने पूर्व लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के पोते के सर्विस सेंटर में तोड़-फोड़ कर वहां उत्पात मचाया था.
कमलेश कालरा विवाद
इसी तरह पार्षद कमलेश कालरा और जीतू यादव विवाद में पुलिस ने 21 आरोपियों की गिरफ्तारी की वहीं मुख्य आरोपी जीतू यादव ने खुद को थाने में सरेंडर कर दिया था, इस पर पुलिस ने उस पर कोई खास कठोर कार्रवाई नहीं की जिससे उसे आसानी से उसी दिन जमानत मिल गई.
कारोबारी संजय जैसवानी
तीन महीने तक कोई एफआईआर तक नहीं की, कोर्ट की फटकार के बाद मामला दर्ज किया गया. इस मामले में पीड़ित रशियन नागरिक गौरव अहलावत तीन महीने से लगे हुए थे पुलिस केस दर्ज कर ले, लेकिन राजनीतिक दबाव में नहीं हुआ. वहीं कुछ दिन पहले पुलिस ने जैसवानी की कंपनी के एक डायरेक्टर के आवेदन पर दो करोड़ की धोखाधड़ी में केस दर्ज कर दिया था. जबकि सूत्रों का कहना है कि कोई धोखाधड़ी नहीं बल्कि इसमें जानकारी के साथ आपसी रजामंदी से कैश ट्रांसफर हुआ जो पुराना लेनदेन था.
पुलिस पर उठते सवाल
इंदौर पुलिस छोटे मामलों में तो सख्ती दिखाती है, आरोपियों को गिराने और जुलूस निकालने तक की कार्रवाई करती है, लेकिन जब बड़े मामलों की बात आती है, तो चुप्पी साध लेती है. अब सवाल यह है कि क्या पुलिस कानून अपने हाथ में लेने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी या फिर दबाव में आकर अपनी छवि धूमिल होने देगी?

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