नयी दिल्ली, 10 मार्च (वार्ता) केंद्रीय केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन तथा श्रम और रोजगार मंत्री भूपेन्द्र यादव ने सोमवार को कहा कि ई-कचरे का प्रबंधन, एकल उपयोग प्लास्टिक का उन्मूलन और स्वस्थ जीवन शैली को अपनाना जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना करने के लिए जरूरी है।
श्री यादव यहां आयोजित स्वदेशी ज्ञान परंपरा और धारणक्षम विकास पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। मुख्य अतिथि श्री यादव ने इस अवसर पर जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध आवश्यक उपायों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऊर्जा, जल, और खाद्य संरक्षण, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, ई-कचरे का प्रबंधन, एकल उपयोग प्लास्टिक का उन्मूलन और स्वस्थ जीवनशैली तकनीकी विकास के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने ‘एक पेड़ मां के नाम’ के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संकल्प को दोहराया और पृथ्वी के प्रति आभार और सेवा की भावना जागृत करने का आह्वान किया।
शैक्षिक फाउंडेशन, शिवाजी कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय), और राष्ट्रीय सिंधी भाषा संवर्धन परिषद (एनसीपीएसएल) के सहयोग से यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आज हुआ। इस सम्मेलन में शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों ने भाग लिया, जिसमें ‘स्वदेशी ज्ञान के धारणक्षम विकास में योगदान’ पर विस्तृत चर्चा की गई।
समापन सत्र में विशिष्ट अतिथि डॉ. बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के कुलपति प्रो. आर.के. मित्तल, दिल्ली स्किल और एंटरप्रेन्योरशिप विश्वविद्यालय के प्रो. अशोक के. नागावत ने भी संबोधित किया। शैक्षिक महासंघ के अध्यक्ष प्रो. नारायण लाल गुप्ता ने समापन सत्र की अध्यक्षता की ।
कुलपति मित्तल ने कहा कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि पर्यावरण और स्वरोजगार से संबंधित समग्र दृष्टिकोण अपनाते हुए हासिल करने के विचार पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विकेंद्रीकरण प्रणाली अपना और भारत की युवा शक्ति को सही दिशा देना भी जरूरी है।
प्रो. नागावत ने भारत की विचारशील परंपरा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के योगदान पर प्रकाश डालते हुए, आधुनिक तकनीकी माध्यमों का उपयोग कर भारत को विकसित और समृद्ध बनाने का आह्वान किया।
प्रो. गुप्ता ने भारतीय ज्ञान परंपरा की निरंतरता को बनाए रखने और सर्व-सुख की कल्पना पर आधारित विकसित भारत की दिशा में काम करने की बात कही।
सम्मेलन में विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, प्रोफेसर, शिक्षक और शोधकर्ता शामिल थे। इस दौरान कुल नौ तकनीकी सत्रों में 340 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।
