वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा हाल ही में लोकसभा में प्रस्तुत नया आयकर विधेयक देश की आयकर व्यवस्था में सुधार और पारदर्शिता के साथ-साथ राजस्व बढ़ाने के लिए एक बड़ी कोशिश का अहम हिस्सा प्रतीत होता है. ये नया आयकर कानून मौजूदा आयकर कानून 1961 की जगह लेने जा रहा है. देश में वर्ष 1860 में सर जेम्स विल्सन द्वारा आयकर की शुरुआत की गई थी, लेकिन एक सुव्यवस्थित कर प्रणाली के रूप में वर्ष 1922 में व्यापक आयकर कानून लागू हुआ, जिसने सही मायनों में न केवल विभिन्न आयकर प्राधिकरणों को औपचारिक रूप प्रदान किया, बल्कि एक सुव्यवस्थित प्रशासनिक रूपरेखा की नींव भी रखी. वर्ष 1961 में मौजूदा आयकर कानून लागू किए जाने के बाद से अब तक आयकर कानून की विभिन्न कमियों को दूर करने के लगातार छोटे-छोटे प्रयास किए जाते रहे. खासतौर से 1981 में कम्प्यूटरीकरण की शुरुआत के साथ हुई तकनीकी प्रगति ने इलेक्ट्रॉनिक रूप से आयकर चालान की प्रोसेसिंग करने पर ध्यान केंद्रित किया. इस परिप्रेक्ष्य में वर्ष 2009 में ई-फाईल और पेपर रिटर्न की व्यापक प्रोसेसिंग को संभालने के लिए सेंट्रलाइज्ड प्रोसेसिंग सेंटर की स्थापना की गई.पिछले एक दशक में जो अहम सुधार किए गए हैं, उससे जहां आयकरदाताओं को सुविधा मिली, वहीं आयकरदाताओं की संख्या बढ़ाने में भी मदद मिली है. इन सुधारों में प्रमुख रूप से करदाता चार्टर और पहचान रहित समीक्षा (असेसमेंट) तथा करदाताओं के लिए पहचान रहित अपील व्यवस्था महत्वपूर्ण है. इन विभिन्न प्रयासों से पिछले 10 वर्षों में आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या और आयकर संग्रह में तेज वृद्धि देखी गई है.अभी भी बड़ी संख्या में उद्योग-कारोबार सेक्टर में कार्यरत रहते हुए कमाई करने वाले, महंगी आरामदायक व विलासिता की वस्तुओं का उपयोग करने वाले तथा पर्यटन के लिए विदेश यात्राएं करने वालों में से भी बड़ी संख्या में लोग या तो आयकर न देने का प्रयास करते हैं या फिर बहुत कम आयकर देते हैं.
दुनिया की कई छोटी-छोटी अर्थव्यवस्थाओं में संग्रहित किए जाने वाले आयकर का उनकी जीडीपी में बड़ा योगदान है.वस्तुत: कर संग्रह में तेज वृद्धि से बुनियादी ढांचे, सामाजिक सेवाओं और जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए सरकार की क्षमता बढ़ती है. बढ़ता कर राजस्व न केवल अर्थव्यवस्था के नवनिर्माण में मदद करता है, बल्कि यह सरकार को अपने करदाताओं के प्रति जवाबदेह भी बनाता है.
नए आयकर विधेयक में ‘चार्टर ऑफ टैक्सपेयर्स’ है, जिससे कर व्यवस्था में विश्वास और पारदर्शिता बढ़ेगी.वेतनभोगी करदाताओं के लिए विभिन्न प्रावधानों को सहज बनाते हुए हर तरह की कटौती को एक ही धारा के तहत रख दिया गया है. नए विधेयक में मुकदमेबाजी कम करने और टैक्स मामलों को जल्दी सुलझाने पर ध्यान दिया गया है. पुराने कानून में इस्तेमाल किए गए जटिल शब्दों को सरल बना दिया गया है. अब ‘असेसमेंट ईयर’ की जगह ‘टैक्स ईयर’ होगा.टैक्स ईयर 1 अप्रैल से 31 मार्च तक रहेगा.अब क्रिप्टोकरेंसी और अन्य डिजिटल एसेट्स को कैपिटल एसेट माना जाएगा और उन पर टैक्स लगाया जाएगा. इससे डिजिटल संपत्तियों पर टैक्स सिस्टम के बारे में अधिक स्पष्टता आएगी. नए टैक्स रिजीम के साथ ओल्ड टैक्स रिजीम भी जारी रहेगा. निश्चित रूप से नए आयकर विधेयक में आयकर अधिकारियों के अधिकारों और शक्तियों को बढ़ाया गया है. कुल मिलाकर नए आयकर कानून को सुसंगत बनाने की कोशिश की गई. इसी के साथ आयकर दाताओं का दायरा बढ़ाने का भी प्रयास होना चाहिए.
