महाकुंभ सफलता पूर्वक संपन्न हो गया. इस बार के महाकुंभ में गंगा के प्रदूषण को लेकर चर्चा होती रही. खासतौर पर जिन्हें विरोधी सियासत करनी थी, उन्होंने गंगा जी के जल प्रदूषण का सहारा लिया. इसी तरह दिल्ली विधान सभा चुनाव में यमुनाजी का जल प्रदूषण एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा था. जाहिर है हमारे देश में नदी जल प्रदूषण एक बड़ा मुद्दा है. बहरहाल, सियासत तथा आरोप और प्रत्यारोप अपनी जगह है लेकिन नदियों के प्रदूषण का मुद्दा बेहद गंभीर और चिंताजनक है. दरअसल, नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए देश में बड़ा अभियान चलाए जाने की जरूरत है. वस्तुत: जल प्रदूषण एक बड़ा वैश्विक खतरा है. यह खतरा भारत में गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है.
दूषित जल के कारण नदियों में हानिकारक संक्रमण और विकार विकसित होते हैं. हाल के दिनों में स्थिति और भी खराब हो गई है. विशेषज्ञों के अनुसार नदी जल प्रदूषण विभिन्न स्रोतों जैसे कि उद्योग डंपिंग, दिन-प्रतिदिन की मानव और पशु गतिविधियां, अनुचित अपशिष्ट प्रबंधन आदि के कारण होता है. नदियों को प्रदूषण से रोकने के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर निरंतर,ठोस और व्यापक उपाय किए जाने चाहिए. खास तौर पर जल प्रदूषण पैदा करने वाली गतिविधियों के लिए सख्त नियंत्रण उपाय होने चाहिए. प्लास्टिक के उपयोग और सीवेज डंपिंग जैसी गतिविधियों को कम करना चाहिए. नाले, ड्रेनेज का पानी, प्लास्टिक और कारखानों का अपशिष्ट जल रोकने के प्रयास सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ करने होंगे. इसके लिए फैक्ट्रियों को रिसायकल प्लांट लगाना अनिवार्य करना पड़ेगा. गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का जो अभियान केंद्रीय नदी जल विभाग द्वारा किया जा रहा है. उसको देश की सभी नदियों पर लागू करना चाहिए. इसके अलावा, जल से प्रदूषकों और हानिकारक तत्वों को काफी हद तक नष्ट करने के लिए जल शुद्धिकरण पहल को पूरी तरह से किया जाना चाहिए.इन कदमों के बाद जल प्रदूषण को कम करने में बेहतर भागीदारी के लिए जागरूकता फैलाना और जन चेतना को बढ़ाना ज़रूरी कदम हैं.वायु प्रदूषण भी जल की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है.वाहनों, कारखानों या जीवाश्म ईंधन के जलने से निकलने वाले उत्सर्जन से हवा में कार्बन डाइऑक्साइड या सीओ -2 की मात्रा बढ़ जाती है.जल वाष्प कुछ हद तक इस सीओ 2 को अवशोषित कर लेता है. नतीजतन, यह अम्लीय वर्षा का कारण बनता है, जिससे जल निकायों में एसिड की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे जलीय जीवन के साथ-साथ मानव जीवन भी खतरे में पड़ जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि प्लास्टिक नदियों को सबसे अधिक प्रदूषित करता है.
दरअसल,प्लास्टिक एक गैर-बायोडिग्रेडेबल पदार्थ है, जिसका अर्थ है कि इसे विघटित नहीं किया जा सकता है.इस प्रकार, जब भी प्लास्टिक का कचरा जल निकायों में पहुंचता है, तो वे वहीं रहते हैं और विघटित नहीं होते हैं. बदले में, पानी की गुणवत्ता में भारी गिरावट आती है क्योंकि प्लास्टिक का कचरा पानी में विषाक्तता पैदा करता है. इसलिए धार्मिक मेलों और उत्सवों में प्लास्टिक पूरी तरह प्रतिबंधित होना चहिए. इसके लिए व्यापक जनजागरण अभियान भी चलाना चाहिए. नदियां दरअसल हमारी जीवन रेखा हैं. हमारी संस्कृति और सनातन परंपरा नदियों के तट पर ही पोषित और पल्लवित हुई है. इसलिए नदियां हमारे लिए आस्था का केंद्र भी हैं. अगले लगातार वर्षों में नासिक, हरिद्वार और उज्जैन में कुंभ मेले लगने वाले हैं. इसलिए नदियों के प्रदूषण को रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ ही गैर सरकारी स्तर पर भी निरंतर और व्यापक प्रयास होने चाहिए.
