ग्वालियर चंबल डायरी
हरीश दुबे
एक नवम्बर 1956 को जब मप्र का गठन हुआ, उस वक्त नवगठित प्रदेश के चारों राजभोगी शहरों ग्वालियर, इंदौर, भोपाल और जबलपुर के बीच ग्वालियर को प्रत्येक मामले में सबसे बड़ा शहर होने का दर्जा प्राप्त था लेकिन नवीन प्रदेश में राजधानी ग्वालियर से छिनकर भोपाल जाने के बाद इस ऐतिहासिक शहर के पिछड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अब तलक जारी है। लंबे समय तक कांग्रेस के शासन के बाद प्रदेश में पहले जनता पार्टी और फिर भाजपा के रूप में दूसरी वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति को सत्ता में रहने का मौका मिला लेकिन ग्वालियर वह पहले जैसा स्थान कायम नहीं कर सका।
इंदौर काफी आगे निकल गया और राजधानी होने के नाते भोपाल को तो आगे रहना ही था। बहरहाल, अब ग्वालियर को पहले जैसा बुलंद मुकाम दिलाने के लिए कई स्तरों पर काम चल रहा है। अरबों रूपए की लागत से ऐसे प्रोजेक्टों पर काम चल रहा है जिनके पूरा होते ही ग्वालियर का पुराना वैभव फिर लौटेगा। रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट का कायाकल्प किया जा रहा है तो शहर के बीच से थ्री लेन वाली एलीवेटेड रोड बनाई जा रही है।
यमुना एक्सप्रेस वे की तर्ज पर ग्वालियर-आगरा ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे बहुत जल्द पूर्ण होने वाला है। 88.4 किमी का यह एक्सप्रेस-वे तीन प्रमुख राज्यों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाएगा और इसके बाद ग्वालियर दिल्ली के और करीब हो जाएगा। शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य सेवाओं और औद्योगिक विकास के लिए मध्यभारत की राजधानी रह चुके इस शहर में और भी कई काम हो रहे है। भीड़भाड़ वाले इलाके महाराज बाड़े पर बनने वाली मल्टी लेवल पार्किंग से शहरवासियों को पार्किंग की समस्या से निजात मिलेगी तो हॉस्पिटल सेक्टर में जल्द ही बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। इन प्रोजेक्ट्स से शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर, यातायात, स्वास्थ्य और उद्योग क्षेत्र में तरक्की के नए चांद चमकेंगे।
मेला कब शुरू हुआ, कब खत्म, पता ही नहीं चला
दो माह तक ग्वालियर को गुलजार करने के बाद ग्वालियर व्यापार मेला का बीती रात समापन हो गया। ऐसे मौके कम ही आए हैं कि जब ग्वालियर मेला का न तो उदघाटन समारोह आयोजित हुआ और न समापन समारोह। समापन तिथि से तीन रोज पहले सिंधिया मेला परिसर में ही बने एक बैक्विट हॉल में व्यापारियों के कार्यक्रम में तशरीफ लाए लेकिन मेला अवलोकन के लिए नहीं गए। सत्ता के गलियारों में धमक रखने वाले अन्य स्थानीय वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों का मेला के प्रति यही रुख रहा। दरअसल, सत्ता दल के सभी स्थानीय छत्रप मेला प्राधिकरण की अध्यक्षी अपने अपने पट्ठों को दिलाना चाहते हैं लेकिन गुटीय समीकरणों के उलझने से पिछले छह साल से मेला प्राधिकरण राजनीतिक नेतृत्व विहीन है।
अधिकारी ही मेला को चला रहे हैं। बहरहाल, इस बार ग्वालियर मेला ने ढाई हजार करोड़ का कारोबार किया है। यह अभी तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। लेकिन इसमें करीब करीब पूरी भागीदारी ऑटोमोबाइल सेक्टर की रही है। अन्य सेक्टरों की बात करें तो मेला सिर्फ झूला और खेल तमाशा सेक्टर तक ही सिमटा रहा। याद करें,यह वही मेला है जहां चालीस साल पहले एयरफोर्स अपने पुराने हेलीकॉप्टर बेचने के लिए प्रदर्शनी लगाती थी। जाहिर है कि ग्वालियर मेला की साख दिन पर दिन गिरती जा रही है। हर साल मेला के समापन से दो रोज पहले अधिकारी समीक्षा बैठक कर अगले मेले को और खूबसूरत बनाने के लिए कागजों पर लकीरें खींचते हैं जो जमीनी हकीकत से दूर होती हैं।
महापौर और सभापति की निधि नहीं बढ़ने देगी भाजपा
महापौर डॉ.शोभा सिकरवार ने ग्वालियर नगर निगम के बजट में महापौर निधि 6 करोड़ से बढ़ाकर 10 करोड़, सभापति निधि 5 करोड़ से बढ़ाकर 9 करोड़ और पार्षद निधि 65 लाख से बढ़ाकर 1 करोड़ करने की घोषणा की थी। लेकिन भाजपा ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पार्षदों की निधि 65 लाख रुपये से बढ़ाकर 1 करोड़ करने संबंधी प्रस्ताव से तो भाजपा सहमत है लेकिन महापौर निधि 6 करोड़ से बढ़ाकर 10 करोड़ करने और सभापति की निधि 5 करोड़ से बढ़ाकर 9 करोड़ करने के प्रस्तावों को सदन में पारित न होने देने के लिए कमर कस ली है। महापौर भले ही कांग्रेस की हैं लेकिन परिषद में भाजपा का अच्छा खासा बहुमत है। चुनाव के समय दोनों दलों की करीब करीब बराबर की हैसियत थी लेकिन निर्दलीयों और कुछ कांग्रेसियों के पाला बदल ने भाजपा को बहुमत में ला दिया। अब सदन में भाजपा पार्षदों की संख्या 42 है जबकि कांग्रेस पार्षदों की संख्या मात्र 24 ही रह गई है। यह आंकड़ा देखें तो महापौर व सभापति निधि में वृद्धि के प्रस्ताव को गिराने के लिए भाजपा को ज्यादा परिश्रम नहीं करना पड़ेगा।
गुटबाजी चालू
जिला स्तर तक संगठन चुनाव प्रक्रिया निबटने के बाद भी भाजपा गुटबाजी से मुक्त नहीं हो सकी है। सिंधिया ग्वालियर आए तो शहर सदर राजौरिया उनके लगभग हर कार्यक्रम में नजर आए लेकिन नरेंद्र सिंह के समर्थक माने जाने वाले देहात सदर राजपूत दूर दूर ही रहे…!
