सुप्रीम कोर्ट ने कुमारस्वामी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई रद्द करने से किया इनकार

नयी दिल्ली, 26 फरवरी (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने केंद्रीय भारी उद्योग और इस्पात मंत्री एचडी कुमारस्वामी के कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल से जुड़े भूमि विमुद्रीकरण मामले में उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई रद्द करने से इनकार कर दिया है।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और राजेश बिंदल की पीठ ने मंगलवार को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में 2018 के संशोधन के तहत छूट की मांग करने वाली श्री कुमारस्वामी की याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि संशोधन को पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

इस निर्णय से बनशंकरी में 02 एकड़ और 24 गुंटा भूमि के विमुद्रीकरण के संबंध में मुकदमे की कार्रवाई का मार्ग प्रशस्त होता है, जिसे 1997 में बेंगलुरु विकास प्राधिकरण (बीडीए) द्वारा अधिग्रहित किया गया था। बाद में बीडीए की आपत्तियों के बावजूद 2010 में इस भूमि को निजी पक्षों को 4.14 करोड़ में बेच दिया गया था।

यह मामला एक निजी शिकायत से शुरू हुआ था, जिसके कारण लोकायुक्त पुलिस ने भारतीय दंड संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और कर्नाटक भूमि (हस्तांतरण प्रतिबंध) अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के तहत जांच की। केंद्रीय मंत्री ने पहले कर्नाटक उच्च न्यायालय में प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) को चुनौती दी थी, लेकिन 2015 में उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। 2016 में सुप्रीम कोर्ट में एक बाद की अपील भी जांच को रोकने में विफल रही।

वर्ष 2019 में, जब श्री कुमारस्वामी मुख्यमंत्री के रूप में अपना दूसरा कार्यकाल पूरा कर रहे थे, तब मामले में एक क्लोजर रिपोर्ट दायर की गई थी। हालांकि, विशेष न्यायाधीश (एमपी और एमएलए) ने रिपोर्ट को खारिज कर दिया और अभियोजन के लिए पर्याप्त आधारों का हवाला देते हुए उन्हें ट्रायल के लिए बुलाया। बाद में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने आरोपों की गंभीरता की पुष्टि करते हुए समन आदेश को बरकरार रखा।

पूर्व मुख्यमंत्री की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने वर्ष 2018 में संशोधित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 का हवाला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दलील दी कि सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना मुकदमे की कार्रवाई जारी नहीं रह सकती। हालांकि, कर्नाटक सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता हरिन रावल और अतिरिक्त महाधिवक्ता अमन पंवार ने तर्क दिया कि मंजूरी अनावश्यक थी क्योंकि श्री कुमारस्वामी अब सार्वजनिक पद पर नहीं हैं और संशोधन को पिछले अपराधों पर लागू नहीं किया जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य की दलीलों से सहमति जताई और केंद्रीय मंत्री की याचिका को खारिज कर दिया, जिससे मुकदमे को आगे बढ़ने की अनुमति मिल गई। जैसे-जैसे कानूनी लड़ाई तेज होती जा रही है, इस मामले के कर्नाटक में महत्वपूर्ण राजनीतिक परिणाम होने की उम्मीद है।

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