कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन्हें राजनीति से ऊपर रखा जाना चाहिए. जिन देशों में लोकतंत्र को परिपक्व माना जाता है वहां विदेश नीति, आर्थिक नीति, सेना यानी सुरक्षा और शिक्षा को राजनीति से ऊपर रखा जाता है. भारत विविधताओं वाला देश है. यहां अनेक भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं. इसलिए भारत में भाषा भी उन विषयों में शामिल होनी चाहिए, जिन्हें राजनीति से ऊपर माना जाता है.दरअसल,नई शिक्षा नीति के बहाने तमिलनाडु सरकार जिस तरह भाषाई विवाद को बढ़ावा दे रही है वह आग से खेलने के समान है.भाषा ऐसा भावनात्मक मुद्दा है, जिसको लेकर अतीत में कई बार हिंसा हुई है. तमिलनाडु में ही हिंदी विरोध के नाम पर कम से कम तीन ऐसे उग्र आंदोलन हुए हैं, जिनमें सौ से अधिक लोगों की जानें गईं हैं. कन्नड़ – मराठी विवाद और बेलगांव को भाषा के आधार पर महाराष्ट्र में शामिल करने को लेकर जो आंदोलन 60 के दशक में छेड़ा गया था,उसमें 157 लोगों की जानें गई थी. पंजाबी और हिंदी के बीच पंजाब में भी हिंसक संघर्ष हुआ है. जाहिर है तमिलनाडु सरकार शिक्षा नीति के बहाने भाषा विवाद को भडक़ा कर आग से खेल रही है. हालांकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर भी विवाद करना $गलत है. महान दार्शनिक प्लूटो का कथन है, शिक्षा राजनीति की दासी नहीं, बल्कि सत्य और प्रगति का मार्गदर्शक होनी चाहिए. लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश के राजनीतिक दल शिक्षा को भी अपनी स्वार्थ पूर्ण राजनीति का माध्यम बना रहे हैं. दरअसल,शिक्षा नीति-2020 को लेकर तमिलनाडु सरकार द्वारा केंद्र सरकार से की जा रही राजनीतिक रस्साकशी न केवल अवांछनीय है, बल्कि तमिलनाडु के छात्रों के हित में भी नहीं है. यह भारतीय संविधान की भावना के अनुरूप भी नहीं है. वर्तमान विवाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन द्वारा अपनाए जा रहे रवैए के कारण हो रहा है. एमके स्टालिन शिक्षा नीति के त्रिभाषा फार्मूले और कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट का विरोध कर रहे हैं. त्रिभाषा सूत्र को लेकर उनका आरोप है कि यह तमिलनाडु पर हिंदी और संस्कृत को थोपता है और इससे तमिल भाषा और संस्कृति पर खतरा है. स्टालिन ने शिक्षा नीति को समग्र शिक्षा अभियान और पीएम श्री स्कूल से जोडऩे के लिए भी केंद्र सरकार की आलोचना की है और प्रधानमंत्री मोदी से समग्र शिक्षा अभियान के तहत धन जारी करने की अपील की है. दरअसल, तमिलनाडु में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव हैं. भाषा विवाद को हवा दे कर स्टालिन राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं. अभी जिस शिक्षा नीति का विरोध स्टालिन कर रहे हैं, उस पर उनकी सरकार 2020 में सहमति जता चुकी है.यही नहीं,यह शिक्षा नीति तमिलनाडु सहित देश के चारों कोनों से 2.5 लाख ग्राम पंचायतों और 676 जिलों के शिक्षाविदों, जनप्रतिनिधियों से प्राप्त सुझावों के आधार पर तैयार की गई है. यानी इसकी निर्माण प्रक्रिया में व्यापक सहमति बनाने का प्रयास किया गया है. इस संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि शिक्षा नीति को बनाने वाली समिति के अध्यक्ष के. कस्तूरीरंगन स्वयं तमिल मूल के हैं. स्टालिन का यह आरोप भी शरारत पूर्ण प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार त्रि-भाषा फार्मूले की आड़ में हिंदी और संस्कृत को थोप रही है. जबकि इस फार्मूले के तहत छात्र अपनी मातृ भाषा और अंग्रेजी के अलावा किसी भी अन्य भारतीय भाषा को चुन सकते हैं. जाहिर है शिक्षा नीति और भाषा को लेकर जिस तरह की राजनीति तमिलनाडु में चल रही है वह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और अनुचित है.