सवालों के घेरे में पुलिस अस्पताल
जबलपुर:आम जनता को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली की हालत तो आमतौर पर देखने को मिल जाती है, लेकिन पुलिस लाइन स्थित पुलिस अस्पताल की हालत देखकर कोई भी हैरत में पड़ सकता है। जिले की सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे लगभग साढ़े चार हजार पुलिसकर्मियों के इलाज के लिए जिस अस्पताल का निर्माण हुआ वह उद्देश्य विहीन साबित हो रहा है। उसमें न बेड है और न सफाई की व्यवस्था। इतना ही नहीं, अस्पताल में गिने चुने कर्मचारियों और डाक्टर की तैनाती हैं। ऐसे में पुलिसकर्मियों की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें निजी अस्पतालो के भरोसे रहना पड़ता है।
दो महिला नर्सों के भरोसे अस्पताल
पुलिस अस्पताल अव्यवस्थाओं का मारा है, यहाँ सर्दी खाँसी का उपचार भी मुश्किल से हो पाता है। वहीं राजधानी भोपाल में पुलिस कर्मियों के लिए बड़ा अस्पताल चालू हो चुका है, जहाँ पर मरीजों को ओपीडी से लेकर वार्ड में भर्ती करने तक की सुविधा है। लेकिन नवभारत द्वारा जब पुलिस अस्पताल जबलपुर की पड़ताल की गई तो यह अस्पताल खुद बीमार समझ आ रहा था। यहां ओपीडी के नाम पर दो चेंबर दिखाई पड़े। स्टाफ के नाम पर दो महिला नर्सें मौजूद है। जानकारों ने बताया कि 78 वर्षीय ईएनटी स्पेशलिस्ट डॉ. एच एन मिश्र यहां सुबह 8.30 से 1 बजे तक बैठते है। इसके अलावा यह अस्पताल दिनभर सुनसान पड़ा रहता है।
कभी था 52 बिस्तरों का अस्पताल
सूत्रों ने बताया कि यह अस्पताल कभी 52 बिस्तरों का हुआ करता था। जो अब घटकर सिर्फ 12 बिस्तरों का रह गया है। इस अस्पताल के भीतर कबाड़खाने जैसे हालात है। बता दे कि शहर के थानों से एकत्रित होने वाला कबाड़ का सामान यहाँ पर लाकर रख दिया जाता है। एक अनुमान के अनुसार हर दिन यहां तकरीबन 15 से 20 मरीज आते हैं, जो सामान्य बीमारी वाले होते हैं, क्योंकि यहाँ मरीजों को भर्ती करने की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
इनका कहना है
पुलिस अस्पताल की व्यवस्थाओं को मॉनिटर किया जाएगा। तत्कालीन एसपी ने इस अस्पताल का रिनोवेशन करवाया था। अस्पताल में डॉक्टरों की तैनाती भी रहती है।
अनिल सिंह कुशवाहा, पुलिस महानिरीक्षक
