नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को एक बड़ा झटका देते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें वेदांता लिमिटेड और राव्वा ऑयल सिंगापुर के पक्ष में आए विदेशी मध्यस्थता फैसलों का विरोध किया गया था। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश में दखल देने से साफ इनकार कर दिया, जिसके तहत कंपनियों को लगभग 830 करोड़ रुपये (99 मिलियन डॉलर) के दावों से जुड़े मध्यस्थता फैसलों को लागू करने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट के फैसले में कानूनी रूप से कोई त्रुटि नहीं है।
शीर्ष अदालत ने लंबी मुकदमेबाजी पर जताई गहरी नाराजगी, कहा- इस तरह तो कोई भी आप पर भरोसा नहीं करेगा
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दो दशक से अधिक पुराने मध्यस्थता फैसलों को बार-बार चुनौती देने के लिए केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई। पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि एक ओर देश को मध्यस्थता और अंतरराष्ट्रीय निवेश का हब बनाने की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, वहीं दूसरी ओर लागू करने के चरण में इस तरह फैसले को अटकाए रखना गलत संदेश देता है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि इस प्रकार की लंबी और अनावश्यक मुकदमेबाजी से वैश्विक निवेशकों का भारत के मध्यस्थता ढांचे और न्यायिक प्रक्रियाओं से भरोसा उठ सकता है।
कृष्णा-गोदावरी बेसिन के राव्वा ऑयल फील्ड से जुड़ा है पूरा मामला, 1994 के प्रोडक्शन-शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट पर चल रहा था विवाद
यह पूरा कानूनी विवाद कृष्णा-गोदावरी बेसिन में स्थित ‘राव्वा तेल क्षेत्र’ के विकास से जुड़ा हुआ है, जिसके लिए सरकार और ओएनजीसी, वीडियोकॉन, राव्वा ऑयल व केर्न एनर्जी (अब वेदांता) के कंसोर्टियम के बीच 1994 में प्रोडक्शन-शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट हुआ था। कुआलालंपुर स्थित मध्यस्थता न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) ने साल 2004 और 2016 में इन कंपनियों के पक्ष में फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद अब केंद्र सरकार की आपत्तियां पूरी तरह खारिज हो गई हैं, जिससे वेदांता समूह को बड़ी कानूनी राहत मिली है।

