कांग्रेसी गांधीवाद बनाम भाजपाई गांधीगिरी 

दिल्ली डायरी 

प्रवेश कुमार मिश्र 

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर देश में चल रहा घमासान अब एक नए और दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है. इस पूरे विवाद में दोनों मुख्य दलों की रणनीतियों का बदलाव भारतीय राजनीति के बदलते ढर्रे को साफ बयां कर रहा है. आरंभिक दिनों से ही कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन वोट बचाओ, देश बचाओ अभियान के तहत पूरी तरह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाते हुए गांव से शहर तक सड़कों पर उतरे. कांग्रेसी रणनीतिकारों का यह अंदाज गांधीवादी मूल्यों पर आधारित था, जहां वे खुद को सीधे जनता की लोकतांत्रिक आवाज के रूप में पेश कर रहे थे. लेकिन इसके विपरीत शुरुआती दौर में सरकार और भाजपा का रवैया बेहद आक्रामक था. उन्होंने विपक्ष के इस आंदोलन को अराजकता फैलाने की कोशिश करार दिया और पूरी ताकत से मुख्य चुनाव आयुक्त के बचाव में तीखे पलटवार किए. लेकिन जैसे-जैसे विपक्ष का यह आंदोलन बढ़ा सत्तापक्ष को यह अहसास होने लगा कि उनके इस तीखे और आक्रामक अंदाज से जनता के बीच माहौल उनके खिलाफ बन सकता है. इसके बाद भाजपाई रणनीतिकारों ने तुरंत अपनी रणनीति बदल दी. भाजपा नेताओं ने अब पलटवार के आक्रामक अंदाज को छोड़कर गांधीगिरी का रास्ता अख्तियार कर लिया है. विपक्ष के दांव की काट के लिए भाजपा अब गांव-गांव पदयात्राएं आयोजित करने जा रही है. इसलिए कहा जा रहा है कि गांधीवादी तरीकों से शुरू हुए इस आंदोलन को दबाने में नाकाम रहने के बाद, अब सरकार खुद को बचाने के लिए उसी गांधीगिरी की शरण में जाने को मजबूर हुई है.

सपा व कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर टकराव बढ़ा

सपा और कांग्रेस के रणनीतिकार अब आगामी चुनावों में सीटों के बंटवारे को लेकर आमने-सामने आ गए हैं. उत्तर प्रदेश के विधानसभा सीटों के चयन और दावों को लेकर दोनों दलों के बीच खींचतान चरम पर पहुंच चुकी है. कांग्रेसी रणनीतिकारों का मानना है कि हालिया जन-आंदोलनों और पदयात्राओं के जरिए जमीन पर उनका जनाधार मजबूत हुआ है, इसलिए वे पहले की तुलना में अधिक सीटों पर अपनी हिस्सेदारी ठोक रहे हैं. दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी अपने मजबूत क्षेत्रीय समीकरणों और कैडर के दम पर ड्राइविंग सीट छोड़ने को तैयार नहीं है. सपा नेताओं का तर्क है कि गठबंधन की सफलता जमीनी हकीकत और क्षेत्रीय ताकत के सही आकलन पर टिकी होनी चाहिए, न कि किसी दल की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं पर. सपा नेता कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को सीधी चुनौती देने की मुख्य ताकत उनके पास है, इसलिए कांग्रेस को जमीनी ताकत के अनुसार ही सीटें स्वीकार करनी चाहिए. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि दोनों दलों के बीच बैठकों और बंद कमरों की चर्चाओं का दौर तो जारी है, लेकिन सीटों के चयन पर पेंच लगातार फंसता जा रहा है. ऐसे में अगर इस आंतरिक टकराव को समय रहते नहीं संभाला गया, तो साझा आंदोलनों से बनी विपक्षी एकजुटता को जमीनी स्तर पर बड़ा झटका लग सकता है.

जदयू के आंतरिक बिखराव पर राजद की नजर

बिहार की सियासत में इन दिनों एक अलग तरह की उथल-पुथल दिख रही है. सत्तारूढ़ जदयू के भीतर मचे अंदरूनी घमासान और ताबड़तोड़ अनुशासनात्मक कार्रवाइयों ने राजद को एक बड़ा सियासी मौका दे दिया है. राजद के भीतर इस बात को लेकर गहरी रणनीतिक हलचल है कि जदयू में चल रही यह अंतर्कलह महज एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के बाद पार्टी में पैदा होने वाले नेतृत्व के शून्य और आंतरिक असंतोष का सीधा संकेत है. राजद नेता अब खुलकर दावा करने लगे हैं कि जदयू में कई अलग-अलग खेमे बन चुके हैं. कुछ नेता जहां अपनी पुरानी समाजवादी विचारधारा को लेकर असहज महसूस कर रहे हैं, वहीं कुछ गुट भाजपा के एजेंडे के सामने पूरी तरह सरेंडर करने को व्याकुल हैं. राजद इस बिखराव को भांपते हुए वेट एंड वॉच की मुद्रा में है, ताकि आने वाले समय में असंतुष्ट धड़े को अपने पाले में खींचा जा सके.

सिकुड़ते जनाधार से बेचैन बसपाइयों को नए साथी की तलाश 

उत्तर प्रदेश की सियासत में कभी सोशल इंजीनियरिंग के दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा आज अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है. लगातार सिकुड़ते जनाधार और पार्टी के भीतर मची आंतरिक कलह ने बसपा के बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं को बेहद बेचैन कर दिया है. चुनावी मैदान में एक के बाद एक मिल रही शिकस्त और कैडर वोट बैंक में हो रही लगातार सेंधमारी के बाद, अब पार्टी के भीतर एक नए राजनीतिक साथी की तलाश को लेकर दबी जुबान में चर्चाएं तेज हो गई है. कहा जा रहा है कि राजनीतिक शून्यता से बाहर निकलने के लिए अब बसपाइयों को एक मजबूत बैसाखी या नए गठबंधन साथी की शिद्दत से तलाश है. हालांकि मायावती का रुख अब भी एकला चलो का ही दिखाई दे रहा है, लेकिन आंतरिक दबाव और अस्तित्व को बचाने की यह छटपटाहट आने वाले दिनों में बसपा को किसी बड़े और अप्रत्याशित सियासी समझौते के लिए मजबूर कर सकती है. इसलिए बसपा के लोग पर्दे में रहकर समान विचारधारा वाले दलों से बात कर रहे हैं.

दिल्ली के व्यापार पर आंदोलनों से पड़ा गहरा असर

मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और मतदाता सूची विवाद को लेकर जारी राजनीतिक घमासान का सीधा और सबसे कठोर प्रहार दिल्ली के बाजारों पर हुआ है. लगातार हो रहे प्रदर्शनों, घेराव और सुरक्षा बैरिकेडिंग के चलते कनॉट प्लेस, चांदनी चौक, करोल बाग और सदर बाजार जैसे प्रमुख व्यापारिक केंद्रों का कारोबार पूरी तरह मंद पड़ गया है.कहा जा रहा है कि बाहरी राज्यों से आने वाले थोक व्यापारियों की संख्या आधी रह जाने से आपूर्ति श्रृंखला टूट चुकी है. दिल्ली के प्रमुख व्यापारिक संगठनों का अनुमान है कि यदि यह गतिरोध कुछ और दिन जारी रहा, तो दिल्ली के खुदरा और थोक व्यापार को होने वाला नुकसान सैकड़ों करोड़ के आंकड़े को पार कर जाएगा, जिसकी भरपाई आने वाले कई महीनों तक संभव नहीं होगी. इसका सबसे बुरा असर उन लाखों दिहाड़ी मजदूरों और छोटे दुकानदारों पर पड़ रहा है जिनकी रोजी-रोटी रोज की कमाई पर टिकी है.

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